एक अनसुनी कहानी

एक अनसुनी कहानी

कुछ मुलाकातें... जिंदगी बदलने वाली सीख दे जाती हैं

कुछ लोग जिंदगी में बस कुछ पलों के लिए मिलते हैं, लेकिन जाते-जाते ऐसी बात कह जाते हैं जो लंबे समय तक हमारे भीतर चलती रहती है।

पिछले दो दिनों से एक ऐसी ही मुलाकात मेरे मन में थी। लगा, इसे सिर्फ अपने तक रखना ठीक नहीं होगा। इसलिए आज आपसे साझा कर रहा हूँ।

नाम नहीं बताऊँगा... पहचान भी नहीं बताऊँगा। बस उस इंसान की कहानी का एक छोटा-सा हिस्सा आपके सामने रख रहा हूँ।

एक सुबह रनिंग के बाद मैं ग्राउंड में रुका था। वहीं करीब 38 साल के एक व्यक्ति बैठे थे। शरीर काफी कमजोर लग रहा था। मैं उनके पास बैठ गया और अपने रनिंग के बाद वाले वर्कआउट में लग गया।

बातों-बातों में सहज ही पूछ लिया—

“भाई, रनिंग कर चुके हो?”

उन्होंने कहा—

“नहीं भाई... रनिंग नहीं कर सकता। कुछ मेडिकल इश्यू है।”

मुझे क्या पता था कि इस छोटे-से जवाब के बाद शुरू होने वाली बातचीत मुझे अंदर तक छू जाएगी।

पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी किडनी खराब है और हफ्ते-दो हफ्ते में डायलिसिस होता है। उनके हाथों पर डायलिसिस की सूई के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

उन्होंने बताया कि करीब दो साल पहले तक वह इन्हीं ग्राउंड्स पर दौड़ते थे। जिंदगी ठीक चल रही थी, सपने थे, उम्मीदें थीं। फिर बीमारी ने सब बदल दिया।

कुछ देर बाद बोले—

“जीवन कितना है, आगे नहीं पता। लेकिन कोशिश करता हूँ कि ग्राउंड में आ जाऊँ और उगते सूरज को देखूँ। अच्छा लगता है।”

फिर धीरे से बोले—

“बहुत सपने देखे थे... लेकिन शायद नियति को ये मंजूर नहीं था।”

उनकी बातों में दर्द था, लेकिन शिकायत नहीं।

उन्होंने बताया कि जहाँ उनका इलाज चल रहा है, वहाँ 12 साल की एक बच्ची भी किडनी की इसी समस्या से जूझ रही है। बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखा चुके हैं और अब डायलिसिस चल रहा है।

फिर उन्होंने मोबाइल में अपनी दो साल पुरानी तस्वीर दिखाई।

तस्वीर में एक स्वस्थ और ऊर्जा से भरा नौजवान था।

समय और बीमारी ने बहुत कुछ बदल दिया था।

लेकिन उनकी सोच अब भी मजबूत थी।

मैंने पूछा—

“किडनी भी तो मिल जाती है?”

उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी और परिवार से किडनी मिल रही है, लेकिन वह लेना नहीं चाहते।

कारण बताते हुए कहा—

“अपने साथ किसी का जीवन खराब नहीं करना चाहता। जो किडनी देता है, बाद में उसे भी बहुत परहेज करना पड़ता है। उसे भी कष्ट होता है। जिसने मेरे लिए कोई गुनाह नहीं किया, वो मेरे कारण क्यों कष्ट सहे?”

उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ पल चुप रहा।

कभी-कभी सामने वाला इतना कुछ कह देता है कि जवाब में शब्द नहीं बचते।

उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने दवाई दे रखी है। कुछ दिनों से दवाई छोड़ दी है, लेकिन इसके बावजूद शरीर थोड़ा ज्यादा अच्छा महसूस कर रहा है। सुबह ग्राउंड पर आता हूँ तो और अच्छा लगता है।

फिर बोले—

“इस बीमारी में नींद भी ठीक से नहीं आती... किस्तों-किस्तों में नींद आती है।”

और फिर एक बात कही, जो शायद इस पूरी मुलाकात की सबसे बड़ी सीख थी—

“परेशानी तो है, पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि जीवन से हार मान ली।”

फिर बोले—

“पता नहीं भगवान ने जीवन कितना लिखा है। जितना भी हो, जीना है और उत्साह के साथ ही जीना है।”

मैं उन्हें सुनता रहा।

इतनी बड़ी परेशानी के बावजूद चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। बीमारी की थकान जरूर थी, लेकिन जीवन जीने का उत्साह साफ दिखाई दे रहा था।

ऑफिस के लिए निकलने का समय हो चुका था। उनकी हिम्मत बढ़ाकर मैं ऑफिस के लिए निकल आया, लेकिन रास्ते भर उनकी बातें मेरे मन में चलती रहीं।

लगा, जिंदगी को लेकर हम कितना कुछ सोचते हैं और कभी-कभी एक अनजान इंसान कुछ मिनटों में हमें बहुत कुछ सिखा जाता है।

मुलाकात तो उनसे दोबारा कभी न कभी होगी ही। शायद फिर उसी ग्राउंड में, किसी सुबह, उगते सूरज के सामने।

लेकिन उस दिन की मुलाकात मेरे लिए सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी।

शायद जिंदगी कितनी लंबी है, यह हमारे हाथ में नहीं...

लेकिन जितनी है, उसे किस तरह जीना है—शायद यह जरूर हमारे हाथ में है।

कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनसे मुलाकात कुछ मिनटों की होती है...

लेकिन उनकी एक बात बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहती है।

Comments

  1. आप लिखते बहुत शानदार हो अमित भाई, किसी भी बात को कहने का एक अंदाज होता है, समझने का एक अंदाज होता है, परखने का एक अंदाज होता है, और उसको शब्दों के माध्यम से एक ऐसे पद्यांश और गद्यांश में प्रस्तुत करना आपकी एक महत्वपूर्ण कला है, जिसका मैं पूरी तरह से कायल हूं, लिखना- पढ़ना तो मैं भी बहुत कोशिश करता हूं लेकिन जो आपकी बात है उसका अंदाजे बयान है कुछ और...
    खुश रहो, मस्त रहो, स्वस्थ रहो और ओरो को भी प्रेरित करते रहो..

    हमारी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ हैं...
    परमात्मा उनको भी स्वस्थ करें जिनका अपने यहां जिक्र किया..
    Yashpal S Jangid

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भाईसाहब,
      आपके इतने आत्मीय शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं। मैं तो बस जो महसूस करता हूँ, उसे शब्दों में रखने की कोशिश करता हूँ।
      आपकी प्रार्थना सबसे अनमोल है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें और जीवन में खुशियाँ दें।
      आपका स्नेह और शुभकामनाएँ यूँ ही बनी रहें। 🙏

      Delete
  2. आप की इस पोस्ट ने तो ईमोशनल कर दिया....बहुत सी सीख से लबरेज....
    वही बात है ...वह फिल्मी गीत नहीं है ....सच्चाई है ...अपना हर पल ऐसे जिओ...जैसे कि यह आखिरी हो ....
    क्या खूब बात उन्हो्ंने कह दी .....
    “जीवन कितना है, आगे नहीं पता। लेकिन कोशिश करता हूँ कि ग्राउंड में आ जाऊँ और उगते सूरज को देखूँ। अच्छा लगता है।”
    ऐसे पॉज़िटिव सोच वाले लोगों के आगे बीमारी भी घुटने टेक देती है ...ईश्वर भला करें...बार बार उधर जाएं ताकि उन से फिर मुलाकात हो ...उन्हें यह ज़रूर कहिए कि दवाई लेनी न छोड़ें.....यह गलत बात है ...
    और रही डोनेशन के बारे में ....हम लोगों ने प्रैक्टीकल देखा है दानकर्ता भी भरपूर ज़िंदगी जीते हैं.......वैसे तो बंदा अगर इतना सकारात्मक सोच वाला है, प्राणायाम् और योग भी करते ही होंगे ...यह सब भी बहुत उपयोगी है।
    आप की पोस्ट ने भावुक कर दिया ...हम लोग अपने शरीर, अपनी बुद्धि और अपने पैसे के बारे में सोच कर यूं ही बिना वजह ऐंंठे रहते हैं, लेकिन कुदरत की प्लानिंग का कुछ पता नहीं होता...
    आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे...
    कौन जाने वक्त का कब बदले मिज़ाज....

    यह पोस्ट बहुत से मायूस लोगों की ज़िंदगी में रौनक लाएगी ...उम्मीद का चिराग जलाएगी....
    मेरी भी इस ईश्वर से प्रार्थना है कि वह अनजान बंधु स्वस्थ रहे, परिवार के साथ खुशियां मनाए....
    आपने उस की दास्तां लिखी ...आप का साधुवाद....
    ऐसे ही लिखते रहिए....
    सादर प्रणाम....


    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हमारे आसपास के हीरो: 107 किलो से Boston Marathon तक — अमित मक्कड़ जी की प्रेरणादायक कहानी

गोविंद जी की साइकिल

मेरी पहली मैराथन दौड़