गिल्लू नहीं रहा
गिल्लू नहीं रहा
एक ऐसी कहानी सुनाता हूं आप सभी को जिसमें दुःख तो है किसी के जाने का, पर एक सीख भी है।
बात शुरू करता हूं गिल्लू के किरदार से कि कौन है वह आखिर.....
ये गिल्लू कोई और नहीं, एक बहुत ही प्यारा सा नन्हा जीव जिसकी अठखेलियां बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी इतनी ही प्यारी लगती हैं। जी, मैं बात कर रहा हूं गिलहरी की, जिसे प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा ने गिल्लू के नाम से फेमस कर दिया।
अक्सर सुबह-सुबह खेतों की ओर साइकिल लेकर निकल जाता हूं, खुद से, नेचर से बात करने....
मैंने मोर को नाचते देखा, नील गाय से बातें कीं, चिड़ियों की प्यारी डिसकशन सुनी, शायद कह रही हों कि रोज आना है हमें सुनने....
और वो गिल्लू अक्सर सड़क पार करता मिल जाया करता।
बस उससे एक ही शिकायत थी कि जब आप निकल ही चुके हो और आधे से ज्यादा सड़क पार कर ही चुके हो तो बैक गियर क्यों लगाते हैं? चलो, पीछे भी हो गए तो अब तुरंत आगे बढ़ने की इतनी जल्दी क्यों है...
कई बार गिल्लू जी साइकिल के पहिए के नीचे आते-आते बचे।
पर किस्मत रोज तो मेहरबान होने से रही।
कुछ दिन पहले सड़क पर गिल्लू का एक्सीडेंट हो गया। लगता था कि किसी बाइक के नीचे आया होगा बेचारा...
फोटो भी लिया और उसकी डेड बॉडी को सड़क से हटाकर साइड कर दिया।
सोचता रहा कि क्या गिल्लू इसके लिए जिम्मेदार है?
सड़कें हमने बनाई, तो चलेंगे तो हम जरूर, पर गिल्लू को भी तो सोचना होगा कि डिसीजन ले लिया तो फिर पीछे हटना क्यों है.....
शायद यही गलती की होगी उस नन्हे जीव ने...
कुछ दिन पहले एक कॉलेज में गया था। वहां लगे एक यूनीक बोर्ड ने मेरा ध्यान खींच लिया। बोर्ड गिल्लू से जुड़ा था, शेयर कर रहा हूं।
गिल्लू के लिए स्पेशल रास्ता बनाया गया था और बताया गया था रोड पर जाने वालों को कि “गिल्लू शहंशाह कभी भी इस रास्ते से गुजर सकते हैं, आप सभी सतर्क रहें।”
बहुत अच्छा लगा।
ऐसे गिल्लू के साथ आत्मीयता रखने वाले कॉलेज को धन्यवाद दिल से निकलता है।
सुबह-सुबह साइकिल चलाते गिल्लू के बारे में कुछ ख्याल अक्सर दिमाग में घूमते रहते हैं। सोच रहा था, जल्द ही गिल्लू के बारे में दिल की बात लिखूंगा....
मन करता था कि क्यों ना गिल्लू पर एक केस रजिस्टर्ड कर दिया जाए और जज साहब से कहा जाए कि देखिए साहब, यही है वो अपराधी जो जानबूझकर चलते वाहनों के बीच आ जाता है। बड़ा कन्फ्यूज़ रहता है, ड्राइवर को भी कन्फ्यूज़ कर देता है। सारी गलती इसकी है।
एक बार निर्णय लेकर पीछे क्यों हट जाता है?
सबूत के तौर पर डैशकैम की वीडियो पेश की जाए और बेचारा गिल्लू उन दलीलों को सुनता रहे।
जब उसे अपनी सफाई में कहने का मौका मिले तो बताए—
“मैं भी गलत नहीं था, क्योंकि जान अपनी मुझे भी प्यारी थी। कुछ फैसले इतनी जल्दबाजी में हुए, जिसका नुकसान मुझे उठाना पड़ा। पर अगर सड़क पर थोड़ा संभलकर चले तो मेरी जान बच सकती है। आखिर सड़क पर अकेले इंसान का तो कब्जा नहीं हो सकता, हमारी प्रॉपर्टी को हथियाकर ही तो बनाए हैं ये हाईवे।”
गजब की फुर्ती और बिजली से भी तेज एक्शन वाले इस नन्हे प्यारे जीव की मौत पर दुःख तो होना लाजिमी है।
बचपन का साथी रहा है गिल्लू।
कैसे दादी मां द्वारा छोटी-छोटी रोटियां दीवार पर रख दी जाती थीं और कैसे दोनों हाथों से उठाकर खाता था, सब कुछ तो याद है गिल्लू के बारे में...
बस अब वो गिल्लू हमारा साथ छोड़ गया, लेकिन एक सीख जरूर दे गया—
जीवन में एक बार सोच-समझकर आगे कदम बढ़ा दिए तो लाख दिक्कतें आएं, फिर कदम पीछे नहीं हटाने चाहिए।
इस ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा....
ईश्वर गिल्लू जी की आत्मा को शांति प्रदान करे ...
ReplyDeleteआप की पोस्ट दिल को बहुत छू गई....
और इस संवेदनशील पोस्ट के माध्यम से आपने बहुत से विचारणीय मुद्दे भी उठाए....हमें इन के बारे में सोचने की ज़रूरत है ...
सही बात है हम ही ने गिल्लुओं की टेरेटरी पर अतिक्रमण किया है ...वे तो प्रकृति की गोद में मस्त हैं...हम ही ने सड़कें बिछाईं....और चल पड़े साईकिलें उठा कर, मोटर गाडियां उठा कर उन पर ....
आपकी पोस्ट से मुझे भी आज से लगभग २० साल पुरानी उसी वर्कशाप एरिया की बात याद आ गई ...फाटक से थोड़ा आगे ...मेरे आगे आगे चलते एक स्कूटर सवार के स्कूटर से एक छोटा सा पप्पी टकराया ...दूर गिरा....और स्कूटर वाला अपने बेटे को स्कूल छोड़ने जा रहा था, शायद...मैंने देखा कि उस पप्पी की तो जान ही निकल चुकी थी ....दरअसल वह पांच छः पप्पी लोगों का झुंड सा जो अभी दो चार दिन पहले ही दुनिया में आया था ..और अपनी मां के साथ थोड़ा टहलने निकला था ...उस मां की तड़प जो मैंने देखी, वह मैं कभी नहीं भूला....
गिलहरी तो भाई नहीं दिखी....वह तो चलिए चंचलता या किंकर्त्व्य विमूढ़ता के चक्कर में बलि चढ़ गई लेकिन प्यारा सा कतूरा तो दूर से दिखता है ....आप को भी याद होगा उस सड़क पर सुबह सुबह लोग अंधाधुंध स्पीड से अपने साईकिल स्कूटर कारें दौड़ाया करते थे....
हां, मैंने भी बहुत बार नोटिस किया है कि ये आगे पीछे आगे ....के चक्कर में ये गि्ल्लू जी बाल बाल बचते हैं....देखिए, इन के साथ कोई हादसा होता है तो ये गिनती ही में नहीं आते ...सुनवाई तो क्या, मामले का संज्ञान ही नहीं लिया जाता...लेकिन आपने लिया...आप का साधुवाद...। प्रभु उस को सद्गति प्रदान करें ...।
आपने किसी कालेज में जो बोर्ड देखा ...मैंने भी ऐसा बोर्ड पहली बार देखा ...वाह, जिस के दिमाग में यह बात आई कि ऐसा बोर्ड लगाया जाए, उस को सलाम....कम से कम वहां से गुज़रने वाले लोगों के दिलोदिमाग में यह बात तो रहेगी कि इस सड़क पर छोटे छोटे जीवों का भी हक है ...वैसे यह कहां की बात है, उत्सुकता हो रही है जानने के लिए...
और हां, वह बात भी आपने खूब कही कि वेवरिंग माईंड से बंदा धोखा खा जाता है...जो फैसला एक बार सोच समझ कर लिया तो लिया ....काश, अपनी गिलहरीयां भी इत्ती सी बात समझ जाएं...
आप बहुत बढ़िया लिखते हैं ...विचोरोत्तेजक विषय होते हैं आप के ....ऐसे ही लिखते रहिए....इन विषयों को कोई नज़रअँदाज़ नहीं कर सकता ....आज के बाद आप के जो भी पाठक सड़क पर निकलेंगे तो कहीं न कहीं दिल में उन को गिलहरी का ख्याल तो रहेगा ही ....कि उस का ख्याल रख के चलना है ।
साधुवाद ...इस विषय के बारे में एक अनूठे तरह से सजग करने के लिए..।
बहुत-बहुत आभार 🙏❤️
ReplyDeleteआपने पोस्ट को जिस संवेदनशीलता से पढ़ा और अपने 20 साल पुराने उस अनुभव को साझा किया, उसने मुझे भी भीतर तक छू लिया। उस पप्पी की माँ की तड़प का दृश्य इतने वर्षों बाद भी आपके मन में जीवित है—यही संवेदनशीलता शायद हमें इंसान बनाती है।
गिल्लू के बहाने बात बस इतनी-सी है कि सड़कें हमने बनाई हैं, लेकिन उन पर चलने का अधिकार केवल हमारा नहीं है। ये छोटे-छोटे जीव भी इस धरती के उतने ही हिस्सेदार हैं। हमारी थोड़ी-सी सावधानी और धीमी हुई रफ्तार शायद किसी गिल्लू, किसी पिल्ले या किसी और मासूम की जिंदगी बचा सके।
और उस बोर्ड की बात आपने बिल्कुल सही पकड़ी—कभी-कभी एक छोटी-सी पंक्ति भी इंसान को अपनी रफ्तार के बीच ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देती है।
आप जैसे पाठक जब इतनी आत्मीयता से प्रतिक्रिया देते हैं तो लिखने की प्रेरणा और बढ़ जाती है। 🙏
गिल्लू तो चला गया, लेकिन अगर उसकी कहानी किसी एक इंसान को भी सड़क पर थोड़ा संभलकर चलने की याद दिला दे, तो शायद उसकी कहानी व्यर्थ नहीं गई। ❤️
सादर आभार और साधुवाद आपको भी। 🙏
This comment has been removed by the author.
DeleteBhot hi aacha likha hai uncle aapne
ReplyDeleteBhot saari cheeze sikhne mili sachme ek baar kadam aage badh jaye to peeche hatna solution nhi hota
Thanks a lot Sharthak ji for your comments
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ReplyDeleteगिल्लू सिर्फ एक नन्ही गिलहरी नहीं है , वह हमारी यादों, बचपन और प्रकृति से हमारे रिश्ते का एक छोटा सा हिस्सा है ।
सबसे ज्यादा छू गई बात यह कि आपने गिल्लू की मौत को सिर्फ एक घटना नहीं माना, बल्कि उससे एक सीख भी निकाल ली। सच में, इंसान ने सड़कें बना लीं, लेकिन उन रास्तों पर चलने का हक सिर्फ हमारा नहीं है।
काश, हर सड़क पर इंसान थोड़ा धीमा हो जाए और प्रकृति के इन छोटे-छोटे साथियों के लिए थोड़ा सा रास्ता और थोड़ा सा समय छोड़ दे।
गिल्लू चला गया, लेकिन आपकी कलम ने उसे हमेशा के लिए यादों में जिंदा कर दिया।
गिल्लू को श्रद्धांजलि और आपको इस खूबसूरत एहसास को शब्द देने के लिए दिल से सलाम।
आपके इतने संवेदनशील और आत्मीय शब्दों के लिए दिल से धन्यवाद। ❤️
Deleteगिल्लू मेरे लिए सिर्फ एक छोटी-सी गिलहरी नहीं था, बल्कि उससे जुड़ी यादों ने इस लेख को लिखते समय भावुक कर दिया। आपने जिस तरह उसकी कहानी के उस भाव को महसूस किया, वही मेरे लिए इस लेख की सबसे बड़ी सार्थकता है।
सच कहूँ तो गिल्लू की याद ने मुझे भी यह सोचने पर मजबूर किया कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता सिर्फ प्रेम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके लिए जगह और संवेदना भी रखनी चाहिए।
आपने मेरे शब्दों को जिस अपनापन से पढ़ा और महसूस किया, उसके लिए एक बार फिर दिल से आभार। 🙏❤️