जब किसी खास टॉपिक पर लिखना हो तो सबसे पहले विचार आता है कि शुरू कहां से करूं...
बस इस टॉपिक को शुरू करने से पहले बचपन में पढ़ी वो चंद लाइन याद आ रही है कि जिस प्रकार गूंगा आम के स्वाद का गुणगान नहीं कर सकता, ठीक उसी तरह... था कुछ, जो टीचर समझाया करते थे। ये लाइन आम के लिए बिल्कुल सटीक फिट होती है। हो भी क्यों ना, आम है ही फल ऐसा।
शायद यही वजह है कि आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि बचपन की गर्मियों, छुट्टियों, परिवार और मीठी यादों का भी हिस्सा है। हर किसी के जीवन में आम से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर होती है।
तभी तो फलों का राजा कहलाता है। बड़े-बड़े Mango Festival होते हैं। आम (फल) जब आम (साधारण) हो जाए तो कहने ही क्या... इसकी मिठास का कोई तोड़ नहीं। आप जब दिल खोलकर आम खाते हैं, फॉर्मल्टीज का चोला साइड में रखकर, तभी असली मजा है जनाब। गुठली भी कह पड़े, "अब तो शर्म करो कुछ... अब केवल मैं ही बची हूं..."
आम के सीजन में आम तो हम सभी खाते हैं। बहुत वैरायटी आती है—चौसा, दशहरी, लंगड़ा आदि। पर आज मैं आपसे जिस आम की बात कर रहा हूं, वो जरा खास है, कुछ जुदा-जुदा है बाकी आमों से।
मैं बात कर रहा हूं रटौल आम की, जिसकी एक अलग ही पहचान है। रटौल बागपत जिले के एक गांव का नाम है, जहां यह खास आम पैदा होता है।
इस विशेष किस्म के आम को GI Tag मिला हुआ है। आसान भाषा में समझें तो GI Tag एक तरह की पहचान है, जो बताती है कि कोई चीज़ अपनी खास गुणवत्ता और पहचान की वजह से किसी विशेष जगह से जुड़ी हुई है। जैसे बनारसी साड़ी, दार्जिलिंग की चाय... उसी तरह रटौल आम भी अपनी असली पहचान इसी क्षेत्र से रखता है।
अलग स्वाद है, गहरी मिठास है, रेशे कम हैं और बढ़िया स्वाद है। बस यही स्वाद हमारी साइकिल को अपनी ओर खींच लाया...
दोस्तों के साथ ये ट्रिप कल ही प्लान कर ली थी। कुछ जाबाज़ राइडर्स बड़े उत्साहित थे कि हम भी चलेंगे, पक्कम-पक्का... पर आज सुबह जब कॉल किया तो फोन थक गया उन साथियों को बताते-बताते कि भाई Mango Ride में चलो... सोने के चक्कर में वर्ल्ड बेस्ट Mango का स्वाद चखना रह जाएगा।
खैर, गोल चक्कर पर साइकिल वाले डॉक्टर उर्फ SR गोविन्द जी और एक नए राइडर अंशुल शर्मा (VVIP सोसाइटी, राजनगर एक्स्टेंशन) भी आ गए थे। जिन्होंने अब तक मैक्सिमम 17 km साइकिल चलाई थी।
जिम जाते हैं, रनिंग करते हैं, तो हमारी तरफ से उनकी फिटनेस पर कोई शक नहीं था। लेकिन मन के एक कोने में संदेह जरूर था कि ये राइड लगभग 27 km जाने की और फिर वापसी... यानी कुल मिलाकर 50 km से ज्यादा हो जाएगी। बस ज्यादा दिक्कत ना हो इन्हें।
अपने मन की बात मजाक-मजाक में कह भी दी—"भाई, एक बार सोच लो... अगर लगे तो कोई नहीं, आम हम लेकर आ जाएंगे।"
बोले—"नहीं जी, पक्का चलेंगे अब तो।"
हम बोले—"तो भाई अब बस चलो ही... जो होगा, देखी जाएगी।"
शायद रटौल आम की चुंबकीय शक्ति असर कर रही थी और हमारी साइकिल उस ओर खींची चली जा रही थी...
रास्ते तो कई थे, पर हमने गांव के रास्तों को चुना। वजह साफ थी—ट्रैफिक की पो-पो, चिक-चिक सुननी ही क्यों है, जब दूर-दूर तक फैले धान के खेत, मन को आनंदित करती मोर की मधुर आवाज, चिड़ियों की चहचहाहट, बारिश की बूंदें तन के साथ मन को भी भिगोने को आमादा, चलती ट्यूबवेल से निकलता पानी, गुलाब के खेतों से आती भीनी-भीनी खुशबू और सोंधी-सोंधी मिट्टी की महक पूरे माहौल में चार चांद लगा रही हो।
शहर की भागदौड़ से दूर ऐसे रास्ते हर बार यही एहसास कराते हैं कि असली सुकून आज भी गांवों की मिट्टी में ही बसता है।
भला ऐसे शानदार रूट पर हमारी साइकिल का पहिया ना घूमे, ऐसा कैसे हो सकता था।
प्रकृति को निहारते-निहारते और गूगल आंटी के सहयोग से आखिर हम उस जगह पहुंच ही गए, जिस गांव का नाम आम के लिए विश्व प्रसिद्ध है। जी हां... रटौल गांव।
जायजा लिया सभी बागों का और फिर एक बाग में जाकर रुके। पूछा—"क्या रटौल आम मिल जाएगा?"
बोले—"कितना चाहिए?"
बस यही सुनकर मन खुश हो गया कि चलो... आम अभी है।
(इन्हीं का बाग था ये)
उन्होंने बताया कि बस 15 दिन की बात और है, उसके बाद सीजन खत्म हो जाएगा। यह भी बताया कि कुछ दिन पहले यहां मैंगो फेस्टिवल भी लगा था। अगर हमें पहले जानकारी होती तो शायद पहले ही आ जाते।
तभी समझ आया कि रटौल आम का असली मज़ा सिर्फ उसके स्वाद में नहीं, बल्कि उसके इंतज़ार में भी है। पूरे साल इंतज़ार और फिर कुछ ही दिनों के लिए उसका मौसम... शायद यही उसकी सबसे बड़ी खासियत है।
खैर, जब जागो तभी सवेरा... आम तो था ही। राइड सफलता की ओर बढ़ रही थी। मकसद जो था इस राइड का—रटौल आम खाना।
पेड़ों के साथ ढेर सारे फोटो शूट कर डाले। बनते भी तो थे।
उधर बाग वाले गोविंद जी की साइकिल को निहार रहे थे। हमारी तीनों साइकिलों में वो बिल्कुल ऐसे अलग लग रही थी जैसे मुंबई की मायानगरी से आई कोई हीरोइन।
शायद उनके मन में यही चल रहा था, इसलिए पूछ ही बैठे—"कितने की होगी ये साइकिल?"
मैंने बताया—"ये रोड बाइक है... एक लाख रुपये से ऊपर की है।"
बोले—"ओह्ह तेरी की... इतनी महंगी! हमें तो लगा होगा... हद से हद पच्चीस हजार की।"
आकर्षण का विषय तो होती ही है गोविंद जी की साइकिल।
बातें हुईं उनसे। पूछा कि ऐसा क्या खास है इस आम में, जो सब इतने दीवाने हैं?
मजाकिया लहजे में बोले—"यहां आम ही नहीं, लोगों के बोल में भी उतनी ही मिठास है।"
सच कहूं, उनकी यह बात दिल को छू गई।
मन कहां करता है जाने का, जब ऐसे बाग मिल जाएं... पर घर तो जाना ही था।
एक छोटा सा कपड़े का थैला ले गया था कि कुछ तो लेकर ही आऊंगा।
बताता चलूं कि यही क्वालिटी का आम बाजार में लगभग ₹300 से ₹450 किलो बिकता है, लेकिन हमें वहीं ₹150 किलो मिल गया। ऊपर से दो-तीन आम तो हम ऐसे ही लपेट गए यह बोलकर कि—"देखो भाई, इतनी दूर से साइकिल चलाकर आए हैं... इतना तो बनता है।"
बाग वाला भी हंसते हुए बोला—"ये बात तो है... इतनी दूर से साइकिल चलाकर आए हो, बड़ी बात है।"
लेकिन सच कहूं, उस दिन आम की कीमत रुपये से नहीं, हमारी पचास किलोमीटर से ज्यादा की पैडलिंग से तय हो रही थी। उस मिठास तक पहुंचने के लिए जो मेहनत की थी, वही उसका असली स्वाद थी।
एक छोटा सा पिल्ला, कुछ मुर्गियां और उनके नन्हे-नन्हे बच्चे भी वहीं मस्ती कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे बिना कुछ बोले एकजुट रहने का फायदा समझा रहे हों।
उस पल लगा... कुछ दृश्य कैमरे से नहीं, सिर्फ दिल से कैद होते हैं। हालांकि इस बार कैमरा भी हमारे साथ था... इसलिए वो खूबसूरत पल वीडियो में हमेशा के लिए कैद हो गए।
आम ले लिए गए, थोड़े-थोड़े ही सही। साइकिल पर आखिर कितने ही ले पाते। और दूसरा, यहां तक आकर जो खाने का स्वाद है, वो किसी को अकैसे ऐड गर ऐसे ही मिल जाए तो उसका मोल क्या ही जान पाएगा। उस मिठास तक पहुंचने से पहले शरीर से पसीने के साथ निकले नमक का स्वाद भी तो चखना पड़ा था।
मौज-मस्ती तो हो गई, पर अब घर भी तो जाना था। चल पड़े... रास्ता चुना ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे का।
अच्छा, साइकिल की एक खूबसूरत बात ये भी है कि टेंशन होती नहीं है। चढ़ जाओ कहीं भी लेकर। इस पेरिफेरल पर जो सड़क हमारी रोड से काफी ऊंची थी, अंडरपास के नीचे से देखो तो कम से कम 20 फीट... लेकिन साइकिल है साहब, सड़क के किनारे-किनारे आराम से चढ़ा दी।
मन में यही सोचता रहा कि ये साइकिल नहीं है साहब... दरिया है दरिया। जहां चाहे, वहीं बह जाए। इसका रास्ता कोई कैसे रोक सकता है।
वैसे याद आ रहा है कोविड का समय। जब साइकिल लेकर ऑफिस जाता था और ट्रैफिक जाम में कारें घंटों फंसी रहती थीं। मैं आराम से साइकिल उठाकर उनके बीच से निकल जाता था। उस समय कार वालों के मन में क्या चलता होगा, ये तो वही जानें... लेकिन इतना जरूर सोचते होंगे—"लो जी... यही सही है, हम ही बेकार वाले हैं!"
खैर, आज साइकिल भी बहुत खुश थी। हो भी क्यों ना... बड़े गर्व के साथ सीना चौड़ा किए आम वाला खास बैग जो लेकर चल रही थी हमारी धन्नो।
पर एक बात शायद आप भूल रहे हैं...
सफर अब लगभग 32 किलोमीटर का हो चुका था। और हमारे अंशुल शर्मा जी अपना 17 किलोमीटर वाला पुराना रिकॉर्ड कब का तोड़ चुके थे। अब वो अपने जीवन की पहली हाफ सेंचुरी राइड की ओर बढ़ रहे थे।
शुरुआत में जो चेहरे पर उत्साह था, अब उसकी जगह मेहनत दिखाई देने लगी थी। पैडल तो वैसे ही घूम रहे थे, लेकिन अब हर किलोमीटर अपने साथ एक नई परीक्षा लेकर आ रहा था।
मन में कई बार आया कि अगर ज्यादा दिक्कत हुई तो अपनी साइकिल इन्हें दे दूंगा, ताकि सफर थोड़ा आसान हो जाए। ऑफर भी किया, लेकिन वो कहां मानने वाले थे।
बोले—"अब जब यहां तक आ ही गए हैं, तो इसी साइकिल से पूरा करेंगे।"
बस... यही जिद इंसान को मंजिल तक पहुंचाती है।
बीच-बीच में रुककर हाथ-पैर सीधे करते, पानी पीते और फिर मुस्कुराकर चल पड़ते। हम भी उनके साथ-साथ आगे बढ़ते रहे। अब जिम्मेदारी भी हमारी थी कि उन्हें सकुशल घर तक लेकर जाएं।
इसी बीच अंशुल जी बार-बार एक ही बात दोहरा रहे थे—
"अगर कहीं रास्ते में ट्यूबवेल मिल जाए ना... तो मजा आ जाए।"
हम भी हंसकर कहते—"देखते हैं भाई... ऊपर वाला चाहेगा तो वो भी मिल जाएगा।"
ईस्टर्न पेरिफेरल से लगभग 12 किलोमीटर चलने के बाद हम नीचे उतर गए, क्योंकि यहीं से एक सड़क सीधे हमारे घर की ओर जाती थी।
अब शुरू होने वाला था इस पूरी राइड का सबसे यादगार और सबसे मजेदार अध्याय..
जिस सड़क पर उतरे उसे बोलते हैं पाइप लाइन रोड, जिसमें मुरादनगर की नहर से दिल्ली वालों की प्यास बुझती है। लाइफ़ लाइन है दिल्ली की ये। इसी के साथ-साथ चलना था, बस मुश्किल से 5 km और फिर एक कट से घर की दूरी रह जाती लगभग 6 km।
एनर्जी डाउन हो रही थी और गोविंद जी और मैं एक जगह रुक गए। कमाल की बात, हमें पीछे अंशुल जी दिखाई ही नहीं दिए। सोचा काफी पीछे रह गए होंगे, थोड़ा वेट कर लेते हैं।
इंतजार किया... पर दिखाई नहीं दिए।
मन में आया कि लगता है काफी थक गए होंगे और कहीं आराम कर रहे होंगे। गोविंद जी उन्हें देखने के लिए पीछे चल पड़े।
असली मज़ा तब आया जब मैंने फोन करके पूछा—"भाई, कहां हो?"
उधर से जवाब आया—"मैं तो आपसे आगे निकल गया... आपके सामने से ही निकला हूं!"
बस... यही सुनकर मन खुश हो गया। लगा कि भाई में तो फुल एनर्जी आ गई रटौल आम खाने से।
गोविंद जी को तुरंत फोन करके वापस बुलाया। उन्हें भी पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ।
अब घर बस कुछ ही किलोमीटर दूर था और शायद ट्यूबवेल पर नहाने की इच्छा भी धीरे-धीरे दम तोड़ती दिखाई दे रही थी।
लेकिन शायद ऊपर वाले ने हमारी सुन ली थी...
अचानक एक खेत में दूर से चलता हुआ ट्यूबवेल दिखाई दिया। वहां पहुंचना थोड़ा मुश्किल जरूर था। दीवार के किनारे-किनारे और खेत की मेड़ से होते हुए किसी तरह वहां तक पहुंचे। धान का खेत था और चारों तरफ पानी ही पानी।
जैसे ही ट्यूबवेल के नीचे पहुंचे...
सफर की सारी थकान मानो उसी बहते पानी के साथ बह गई। ठंडे पानी की हर बूंद शरीर ही नहीं, मन को भी तरोताजा कर रही थी।
शायद इसी को कहते हैं कि मेहनत के बाद मिलने वाली छोटी-सी खुशी भी किसी बड़े इनाम से कम नहीं होती।
समय की चिंता बिल्कुल नहीं थी। देर भले ही हो रही थी, लेकिन सच कहूं... उस समय हम सिर्फ घर नहीं लौट रहे थे, बल्कि जिंदगी का एक खूबसूरत पल जी रहे थे।
बात यहीं खत्म नहीं होती साहब...
दिमाग में अभी भी रटौल आम घूम रहा था।
फिर क्या था...
गोविंद जी की जेब में पड़े आम निकाले, ट्यूबवेल के पानी से अच्छी तरह धोए और वहीं खेत की मेड़ पर बैठकर देसी अंदाज़ में उनका स्वाद लिया।
उस पल लगा कि जिंदगी की सबसे बड़ी दावत किसी पांच सितारा होटल में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे, खेतों के बीच, दोस्तों के साथ बैठकर मिलती है।
जिस समय हम ट्यूबवेल पर थे, उस समय हमारी राइड 54 km पूरी हो चुकी थी।
अंशुल शर्मा जी के चेहरे की खुशी देखने लायक थी। आखिर उन्होंने अपने जीवन की पहली हाफ सेंचुरी राइड पूरी जो कर ली थी।
यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर थी, लेकिन रटौल आम की वो मीठी खुशबू, जो उसे बाकी सभी आमों से अलग बनाती है, मन में इस तरह बस गई थी कि उसका स्वाद शायद कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
घर तो लौट आए, लेकिन ऐसा लगा जैसे रटौल का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे साथ ही लौट आया हो।
इन मीठी यादों के साथ सफर हुआ समाप्त... एक प्यारी-सी ग्रुप फोटो, कैमरे में कैद कुछ बेशकीमती लम्हे और दिल में हमेशा के लिए बस गई "रटौल मैंगो राइड"।
कुछ राइड्स किलोमीटर से नहीं, यादों से मापी जाती हैं। यह भी उन्हीं में से एक थी। पैडल 50+ किलोमीटर चले, लेकिन दिल आज भी कभी-कभी रटौल के उसी आम के बाग, उस ट्यूबवेल और उन मीठी यादों में जाकर ठहर जाता है।
आपको यह ब्लॉग कैसा लगा, कमेंट में अवश्य बताएं जिससे शायद मुझे हौसला मिले और ऐसे जीते जागते खूबसूरत सफर को कलमबद्ध करने का......
अमित सिलावट
फिटनेस मोटीवेशनल ब्लॉगर
Truly amazing.. good to see such motivational blogs Amit ji.. you're actually inspiring people like us to spare some time for ourselves.. nd btw.. next time "aam society members ke liye bhi leke aana 😉"
ReplyDeleteThank you so much Nitin ji! 😊 Your words truly mean a lot. It feels great to know that the blog inspired you. And yes... next Mango Ride, society members ke liye bhi kuch na kuch zaroor arrange karne ki koshish rahegi! 😄🥭🚴
Deleteभाई साहब क्या लिखते हैं, क्या शैली है, क्या याददाश्त है, क्या अंदाजा है, और देख तो सभी लेते हैं, बोल भी सकते हैं, लेकिन जिस अंदाज में आप लिखते हो ना वह जगह कुछ हो ना हो उसका स्वाद कुछ हो ना हो वह राइड कुछ होना हो वास्तव में उसका होना आप सार्थक कर देते हो और सबसे बड़ी बात कोई मोमेंट कोई लम्हा कोई आर्टिकल कोई व्यक्ति कोई द्रश्य ऐसी नहीं होती पूरे रास्ते भर जिसे आप अपने ब्लॉक में समाहित ना करते लिखते हों, पशु, पक्षी बच्चे, बूढ़े, कीट पतंगे, रास्ते, नदी, पुल, पेड़, पौधे .......
ReplyDeleteलिखते रहिए मेरे दोस्त और करते रहे इसी तरह से यादों के इस एफडी को जमा जिसका हम ब्याज हमेशा संजोते रहे और उसका मजा लेते रहें... हम आपके उज्जवल भविष्य की और उत्तम स्वास्थ्य की हमेशा कामना करते हैं.....
आप दीर्घायु हों और मानव सेवा में इसी प्रकार अपनी सेवाएं अर्पित करते रहे...
धन्यवाद
आपका अपना यश
आदरणीय यशपाल जी, आपका यह स्नेहपूर्ण संदेश मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है। आपने मेरी लेखनी के जिन पहलुओं को महसूस किया, वही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। आगे भी हर राइड के अनुभव, रास्तों की खूबसूरती और यादों को शब्दों में संजोने का प्रयास करता रहूँगा। आपके आशीर्वाद और शुभकामनाओं के लिए हृदय से धन्यवाद। सादर प्रणाम।
DeleteWah...Sir..
ReplyDeleteVery nice true description of yesterday's experience...
It was really a precious experience for me ...with 2 PRO..Riders...and see the range 55+ Km...I have built a next level confidence in me.. ये सब आपकी कंपनी का कमाल है। शुरुवात में बस 20 कम बता के 55km Ride करादी।kya manual बनाए रखा पूरे रास्ते। करीब 4 घंटे आपके साथ बिताए। एक पल भी ऐसा नहीं लगा कि पहली बार मिल रहे थे हम। यहां तक कि मेरे family ने जब pics videos देखी तो पहला comment बाय ki purane dosto ke saath गये थे kya 😊 मैं कहा मुझे भिवाईसा ही लगा। But subah pahli baar mila aapse।
Kya मजेदार Ride Rahi।
Aam ka बाग़। Tubewell की मसती। Half century Ride ka experience including Road offRoad both।
Ek alag sa aatmvishwas bhar gaya apne अंदर।
अपने अंदर के बचपन को एक्टिव रखतेभुए एंड fitness को priority देते हुए कैसे lifestyle carryon रख सकते hain। Uska live experience hua।
Bahut anokha weekend अनुभव रहा जो सालों तक दिल दिमाग में जिंदा रहेगा एंड आगे न्यू एक्सपीरियंस एंड मोमेंट्स क्रिएट करने के लिए मोटिवेट करता रहेगा।।
Thanks to you and Govind ji...
Keep inspiring and motivating society..
You are ultimate...
Best wishes
अंशुल जी,
ReplyDeleteदिल की कलम से निकले आपके शब्द सीधे दिल तक पहुँचे।
आपका यह स्नेह हमारे लिए किसी सम्मान से कम नहीं। दुआ है कि रटौल के उन आमों जैसी मिठास हमेशा आपके जीवन में बनी रहे, आपकी हर राह खुशियों, अच्छे स्वास्थ्य और नई उपलब्धियों से महकती रहे।
गोविंद जी और मेरी ओर से आपका हृदय से धन्यवाद। ऐसे ही साथ चलता रहे, मुस्कुराहटें बढ़ती रहें और यादगार सफ़र बनते रहें।
फिर मिलेंगे... किसी नई राइड, नई मंज़िल और नए अनुभव के साथ। 🚴♂️💚
आपने जो रटोल आम की बाग की यात्रा का जो वर्णन किया है वह वर्णन बहुत ही शानदार और जीवंत है मुझे पढ़कर ऐसा लग रहा था कि मैं भी रटोल पहुंच गया हूं और रटोल आम की इतनी खूबियां आपने इसमें बताई कि मैं रटोल आम का स्वाद ही चक रहा हूं।
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