गोविंद जी की साइकिल
आस-पास के हीरो
असाधारण लोग, असली कहानियाँ
भाग–1 : गोविंद जी की साइकिल
हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं जो बिना किसी प्रसिद्धि, पुरस्कार या पहचान के अपने जीवन से दूसरों को प्रेरित करते हैं। यह श्रृंखला उन्हीं असली हीरो को समर्पित है, जिनकी कहानियाँ अक्सर सुर्खियों में नहीं आतीं, लेकिन लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहती हैं।"
दोस्तों आज मैं आपके साथ एक ऐसी स्टोरी शेयर करूंगा जिसमें मैंने फर्श से अर्श तक का सफर अपनी आँखो के सामने देखा है। एक ऐसे शख्स की कहानी जिसे पढ़कर आपको लगेगा कि ऐसा भी हो सकता है क्या.....
इस टॉपिक को लिख तो रहा हूं और केंद्र में गोविंद जी और उनकी साइकिल मस्तिक पटल पर इस तरह छपी है कि हजारों भाव है मन के, बस उन्ही को एक सिरे से पिरोना है और आपके सामने वो प्रस्तुत करना है जिसके लिए ये शख्स वास्तव में हकदार है।
सच बोलूं तो फिटनेस मिशन को शुरू किए लगभग 8 साल हो चुके है और बहुत साथियों के साथ जुड़ा, बहुतों को जोड़ा, कारवां बड़ा हुआ और हौसला भी.... कई साथियों ने फिटनेस के फील्ड में अपना लोहा मनवाया। मेरे मन में कई बार एक विचार आता है कि जब फिटनेस की बात आती है तो अनायास ही मिल्खा सिंह, पीटी ऊषा, शिल्पा शेट्टी, मिलिंद सोमन, अक्षय कुमार कई ऐसे चर्चित नाम सामने आते है जिनसे हम सभी परिचित है
लेकिन मुझे लगता है कि हम अपने आस-पास के फिटनेस सुपरस्टार को देख ही नहीं पा रहे । जिनकी कहानियां भले ही अनसुनी हो पर अगर सुना दी जाए तो हजारों लोगों को मोटीवेट करने की शक्ति रखती है और ये मेरा दृढ़ विश्वास है और शायद मेरे इस ब्लॉग को पढ़कर आपको भी मेरी बात पर यकीन हो।
मेरे जीवन को बदलने वाली एक इवेंट थी HDOR जो कि एक 100 डेज का इवेंट होता है जिसमें आप कभी भी, कहीं भी दौड़ सकते है, वॉक कर सकते है। वर्चुअल इवेंट है ये। एक फिटनेस ऐप Strava के माध्यम से ये इवेंट पूरी थी।
जिसमें सन 2020 में मैने 3000 km पूरे किए और अपनी age कैटेगरी में गाजियाबाद में पहला स्थान प्राप्त किया।
उस उत्साह चरम पर था और इस सफर को महसूस किया, एक ऐसा दौर जिया कि शब्दों में बयां होना मुश्किल है, फिर लगा कि अब क्या... कुछ तो करना होगा.. अपने लिए तो कर लिया पर जो सुख जो आनंद मुझे मिला जिससे जीवन की दशा और दिशा ही बदल गई ,क्या किसी और की भी बदली जा सकती है ? सवाल अपने आप से ही थे...
मित्र संतोष और वरुण के साथ मिलकर एक ग्रुप फिटनेस फ्रीक राजनगर एक्स्टेंशन गाजियाबाद बनाया , व्हाट्सएप ग्रुप बनाए, फेसबुक से प्रचार, और रनर्स मिलते तो उनसे बात करके ग्रुप के बारे में जानकारी देते।
| लेफ्ट में संतोष जी, बीच ने में वरुण जी और राइट साइड मै खड़ा हूं |
और लोगों तक उसकी पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया, जिसमें फेसबुक के माध्यम से गोविन्द जी का अनुरोध आया था। मिले, मुलाकात हुई और फिटनेस का सफर शुरू हुआ। बताता चलूँ कि गोविन्द जी हमारे ग्रुप के फाउंडर मेंबर्स में से एक है।
हो सकता है उनका वर्तमान फोटो देखकर आपको हँसी आए कि ये मोटा आदमी भला क्या ही राइड करेगा तो आप बिल्कुल गलत होंगे। बुक के कवर से बुक की क्वालिटी का अंदाजा लगाना मुश्किल है जरा.... मै बस इतना कहूंगा कि यही मोटा पेटर मित्र बहुत बड़ा मोटीवेटर है।
| (पेट छुपा रहे थे ये फोटो में , हमने बोला इसको भी खुलकर बाहर आने दो जरा) |
सबसे पहले आपको बता दूं कि जैसे मछली दौड़ नहीं सकती, और चीता पानी में तैर नहीं सकता, बस कुछ ऐसी ही बात गोविन्द जी के बारे में बताता हूं। 100 दिन वाली फिटनेस इवेंट जिससे मेरे जीवन में परिवर्तन आया, सैकड़ों साथी जोड़े, जिसमें एक थे गोविंद जी भी,
सब इवेंट कर रहे थे पर गोविन्द जी उस इवेंट को दिल से नहीं कर पा रहे थे, या यूँ कहूँ कि अंदर से उनकी इच्छा नहीं थी , पर एक फिटनेस ग्रुप मिला था तो उसके साथ जुड़े रहने के मजबूरी कहे या जिम्मेदारी.. इसका उत्तर शायद वहीं बेहतर जानते है।
(हमारे ग्रुप का लोगो जो हमारे ग्रुप के अजय शर्मा जी ने डिजाइन किया)
कुल मिलाकर किया पर कुछ खास नहीं कर पाए और बस ऐसे ही चलता रहा, हल्का फुल्का, कभी कभी ग्राउंड में देते थे दर्शन, आए वॉक किया और फिर घर, कई कई दिन मिस.... और इवेंट खत्म।
दिन गुजरते गए और फिर एक 100 दिनों का एक साइकिल चैलेंज आया, मै पहले कर चुका था तो उत्साहित था कि बाकी भी करे, और बहुत साथी जोड़े, बहुत सारे हेलमेट खरीदे, क्योंकि हमारा राइडिंग के एक स्लोगन है कि पैडल से पहले हेलमेट , सेफ्टी से कोई समझौता नहीं।
खैर जुड़े तो गोविंद जी मुश्किल से ही, वजह बताते थे कि अमित जी वॉकिंग रनिंग वाला भी नहीं हो पाया, इसे तो रहने ही दो, पर हम हिम्मत हारने वालों में बिल्कुल नहीं थे , बोला कि कोई नहीं , थोड़ी साइकिल रोज ही तो चलानी है। बच्चे की तो होगी, उसी को निकाल लो और इस चैलेंज को पूरा करो और मेडल तो लो।
इस इवेंट में छोटे-छोटे बड़े-बड़े कुछ राइड चैलेंज थे जैसे 20, 50, 100, 200 km जो इन्होंने खुशी-खुशी पूरे किए और इसी इवेंट में एक ग्रुप राइड गाजियाबाद से मेरठ तक गए और आए, लगभग 125 km की हुई थी, सभी प्रैक्टिस में थे , तो हो गई। मेरठ के प्रिंट मीडिया ने कवर भी किया था इस न्यूज को।
खैर चैलेंज खत्म हो गया, क्लोजिंग सेरमनी हुई उत्साह के साथ, और उसके बाद मत पूछिये, दोस्तों की साइकिल फिर ऐसे खड़ी हो गई जैसे मानो कभी चली ही ना हो, पहियों की हवा खड़े-खड़े निकल गई और मानो जैसे मकड़ियों में उसे अपना साम्राज्य घोषित कर दिया हो, ये हालत एक दो राइडर्स को छोड़कर सभी की साइकिल के थे क्योंकि हम वापिस रनिंग ट्रैक पर आ गए थे, बस एक शक्स था जो साइकिल की गद्दी से चिपका रहा......
| (वैसे ये हालात आपको सभी सोसाइटी में आराम से मिल जाएंगे) |
समय कहां रुकता है साहब, चले जा रहा था और गोविंद जी भी अपनी धुन में रमे हुए थे। साइकिल पर जब बैठे हो तो साइकिल वाले दोस्त बन ही जाते है। दिल्ली NCR के बहुत सारे राइडर्स ग्रुप से जुड़े, जानकारी बढ़ी साइकिल के फील्ड की।
सुपर रैंडोन्योर (Super Randonneur) 🚴🏅
सुपर रैंडोन्योर वह साइकिलिस्ट कहलाता है जो एक ही साल में बिना किसी बाहरी मदद के निर्धारित समय के अंदर ये चार लंबी राइड पूरी करता है:
🚴 200 किमी – 13 घंटे 30 मिनट
🚴 300 किमी – 20 घंटे
🚴 400 किमी – 27 घंटे
🚴 600 किमी – 40 घंटे
यह रेस नहीं होती, बल्कि अपनी हिम्मत, धैर्य, योजना और आत्मनिर्भरता की परीक्षा होती है। रास्ते में खाने-पीने और बाकी ज़रूरतों की व्यवस्था साइकिलिस्ट खुद करता है।Super Randonneur साइक्लिंग की दुनिया का एक प्रतिष्ठित सम्मान है, जो यह साबित करता है कि साइकिलिस्ट बेहद लंबी दूरी तय समय में अपने दम पर पूरी करने की क्षमता रखता है।
आपको बता देता हूं अब की हमारे गोविंद जी अब एक साधारण साइक्लिस्ट नहीं रहे, बल्कि साइकिल वाले डॉक्टर उर्फ SR गोविंद जी हो गए है और ये उपाधि उनको मिली उनके हौसले से , उस हिम्मत से जो उन्होंने खुद पर भरोसा करके दिखाई। एक गाना है उसका बीच की लाइन बेहद खूबसूरत है जिसे मैं अक्सर दोस्तों के साथ साझा करता हूं कि सफर खूबसूरत है, मंजिल से भी....
और गोविंद जी के इस SR वाले सफर को मुझे एक बार जानना था , महसूस करना था दिल की गहराइयों से , काफी समय से सोच रहा था और आज मौका मिला, ट्यूबलेवल राइड थी 19.07.2026 को और गोविंद जी अपनी एक नई लेकिन बिल्कुल देशी स्टाइल वाली साइकिल पर आए , पूछने पर बताया कि लोकल के लिए इससे बढ़िया कुछ नहीं, इनफील्ड है ये साइकिलों की, हँसी तो आई बहुत,पर सच हो तो कहा था, इन्हीं साइकिल पर तो हमने पैरों को क्रॉस फंसाकर एक हाथ से हैंडल और एक से रोड पकड़ते हुए राइड सीखी थी, अमिट यादें है, जीवन भर साथ रखेंगी।
ट्यूबवेल पर जो आप हमारा फोटो देख रहे है उस फोटो में हम दोनों इसी टॉपिक पर इस तरह बात कर रहे है जैसे ISRO के दो वैज्ञानिक सेटेलाइट लॉन्च होने के टॉपिक पर गहन विचार-विमर्श कर रहे हो और वो
जब ये ज्ञान दे रहे थे तो इनकी शर्ट पर लिखे शब्दों को भी पढ़ रहा था, पूरे मेल खा रहे थे उनकी बात से...."Work for Your Passion"
हम बोले गोविंद जी पहेली ना बुझाओ, बता दो कौन सी की पहले तो उनका जवाब आया कि 400 KM, चौंक तो मै उसी समय गया कि जो इंसान चार कदम चल नहीं पाता था उसने SR जैसे उस फील्ड में पैर रखा वो भी सीधे 400 km, उत्सुकता बढ़ी तो गोविंद जी ने विस्तार से इसकी बात बताई जिसे बस सुनता गया......
बात शुरू होती है 27 अप्रैल 2024 की सुबह 6 बजे से शुरू होने वाली 400 km राइड से जो SR की पहली इवेंट थी इनकी, होनी थी नोएडा एक्सटेंशन से हरिद्वार हर की पौड़ी तक और फिर वापिस आना था वापिस। जिसके लिए 27 घंटे निर्धारित था।
शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि ये सफर ऐसा होगा, उम्मीद भी नहीं की थी। वैसे तो इन्होंने इसे 25 घंटे में पूरा किया पर इस सफर को जानना ज्यादा जरूरी है जो उन्होंने महसूस किया। गोविंद जी अक्सर कहते है कि साइकिलिंग खुद को खुद से मिलाने का सबसे अच्छा माध्यम है,जब आप साइकिलिंग करते हैं, तो आपको खुद से बात करने सबसे अच्छा मौका मिलता है..
गोविंद जी ने बताया कि जो साइकिल उनके पास थी वो एक हाइब्रिड साइकिल थी और वो उन्होंने अपने बेटे के लिए ली थी। काफी राइड कर चुके थे उस पर 100km, 200 km तो भरोसा था, साइकिल पर भी और उसे ज्यादा खुद पर।
जब राइड स्टार्ट होने वाली थी तो उन्हें लगा कि बाकी तो बड़ी हाईफाई साइकिल लेकर आए है, ऐसा लग रहा था जैसे बड़ी बड़ी ब्रांडेड मर्सिडीज, स्पोर्ट्स कार के बीच मारुति सुजुकी 800 आ गई हो। क्या होगा गोविंद तुम्हारा तो अपने आप को बस यही बताया कि देख भाई अब अपना तो यही राफेल है , यही उड़ाना है बस अब। अब ठान लिया तो ठान लिया, इसी से होगा पूरा अब ये चैलेंज...
कुछ वादे अपने से जो किए जाते है उन्हें जब जीवंत रूप में सफल होते देखते है तो कॉन्फिडेंस बढ़ता है। बस इसी कॉन्फिडेंस के साथ गोविंद जी ने अपना SR का पहला सफर पहले पैडल से कर दिया। वैसे भी बड़े-बड़े मिशन की तो शुरुआत होती ही है पहले कदमों से। एक नन्हा पौधा भी तो विशाल वटवृक्ष बनने की ताकत रखता है।
वो अप्रैल का महीना, गर्मी अपने चरम पर चल रही थी, सड़के आग उगल रही थी और गोविंद जी मौसम की इस चुनौती के साथ सभी राइडर्स के साथ चलने लगे, रास्ते में दिक्कत आनी तब शुरू हुई जब 30 से 40 km के बाद उन्होंने देखा कि सबसे आखिर में वही बचे, खैर चलते रहे, लेकिन रास्ते में धूप और प्यास से हालत जब खराब होने लगी तो उन्होंने हर पांच km में एक पानी की बोतल ली, थोड़ा पिया और बाकी सर पर उड़ेल दिया, गर्मी के मारे हालत खराब होती जा रही थी जैसे जैसे सूर्यदेव दोपहर की और बढ़ रहे थे।
जो कुछ ही देर में सूख जाता लेकिन फिर भी थोड़ी राहत वाली बात हो गई थी। भरी दोपहरी की प्रचंड गर्मी अब अपने पूरे शबाब पर थी, लेकिन गोबिंद जी भी भले ही सबसे पीछे रहे हो, उन्होंने भी इस चुनौती पर विजय पाने की ठान ली और सोच लिया कि कुछ भी हो, गंगा मईया में एक डुबकी लगाकर अपना सारा दर्द दूर कर लूंगा।
सही ही तो कहा था गोविंद जी ने अपने आप से , मुझे दो लाइन याद आ रही है
मिल जाएगी मंजिल भटकते भटकते ही सही,
गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं...
एक छोटा सा वाकया और याद आया जब उन्हें एक उम्रदराज राइडर्स पीछे आते मिले तो इनकी जान में जान आई वो बाद में पता चला कि वो इस फील्ड के दिग्गज राइडर है और पटियाला में डॉक्टर है ऑर्थो के, ये राइड देर से शुरू की थी बस उन्होंने। अब उन्हें पता लग गया कि प्रथम वही है मगर पीछे आने वालो मे। डॉ साहब मामला समझ चुके थे, उन्होंने ना केवल उनकी हिम्मत बढ़ाई बल्कि इस टारगेट को पूरा करने का तरीका भी बताया।
कम लोग होते है आज के समय में जो दूसरों के लिए अपना समय देते है। वो मुलाकात पहली ही रही हो पर थी राइडर्स जी, जिनकी मंजिल, ठिकाना एक ही था, एक दूसरे का उत्साह बढ़ाना कितना मायने रखता है, शायद इससे बढ़िया उदाहरण क्या मिलेगा।
एक बात मैंने अपने पहले ब्लॉग मेरी पहली मैराथन यात्रा में विस्तार से लिखी है कि जैसे हॉफ मैराथन की दूरी होती है 21 km फुल मैराथन की 42 km, इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि केवल दो गुना ही तो भागना है, बल्कि शरीर में एनर्जी धीरे धीरे घटती रहती है जिसके लिए शक्ति रास्ते में लिए जाने वाले फूड से एनर्जी ड्रिंक से पूरी होती है।
अब ऐसा ही मान लो गोविंद जी के केस में कि जैसे 21 km दौड़ने वाला बिना कोई विशेष तैयारी के पहुंच जाए फुल मैराथन 42 km करने और उसके बाद ज्यादा कुछ ना हो ,पर हौसला ऐसा कि मंजिल को भी इनसे मिलने की चाह हो। जैसे कि गोविन्द जी 200 km की राइड कर लिया करते थे और अब 400 km कर रहे थे, शरीर टूट रहा था , विपरीत मौसम में मुश्किल से जैसे तैसे अकेले सबसे पीछे ही सही , पहुंचे हरिद्वार आखिर और आधा सफर तय कर लिया था।
हरिद्वार में ही उन्हें पटियाला वाले डॉक्टर साहब मिले, वो गोविंद जी का इंतजार कर रहे थे। मुसीबत के समय दोस्तों का साथ ना छोड़ना, हाथ ना छोड़ना उसका प्रमाण दिया डॉक्टर साहब ने, जिस इवेंट में हर एक मिनट हर एक सेकंड मायने रखता हो, उसमें किसी के लिए रुकना ही बहुत बड़ी बात है। दिल से नमन करता हूं ऐसी महान शख्सियत को, ये संस्कार ही तो है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते है। शायद इस ब्लॉग की बात उन तक भी पहुंचे, ये उम्मीद करूंगा।
उस समय शायद गंगा मईया भी यही कह रही थी कि चिंता मत कर , कैसे नहीं होगा तुझसे, चाह तो गंगा मईया भी रही होंगी कि गोविन्द मेरे आँचल में आकर उस ठंडक को महसूस करे, थोड़ा आराम करे, आग उगलती सड़कों से किस तरह पूरे दिन साइकिल चलाकर पहुंचा है, कुछ पल तो चैन के मिले मेरे बेटे को....
पर नियति को ये मंजूर ना था क्योंकि सबसे बड़ी बात थी समय सीमा की। अगर एक दिये गए समय में राइड पूरी नहीं हुई तो सारी मेहनत बेकार, और ऐसा गोविंद जी बिल्कुल नहीं चाहते थे और क्विट करने की वो सपने में भी नहीं सोच सकते थे।
खैर वापिसी के लिए रुख किया और अब असली परीक्षा होनी बाकी थी क्योंकि शरीर थककर जवाब दे रहा था, रात हो चुकी थी, सफर लंबा था और साथ केवल दो दोस्त थे एक साइकिल और दूसरा उसे चलाने का हौसला......
अब मैं जो लिख रहा हूं उसे मै अपने अनुभव और गोविंद जी द्वारा बताए गए अनुभव को जोड़कर लिखूंगा क्योंकि जब आप किसी पल को जीते है तो उससे बेहतर कोई नहीं जान सकता....
200 km से ज्यादा राइड हो चुकी थी और सफर आधा बाकी पड़ा था, अब करना तो था ही और समय से करना था, कोई चारा कहां था वैसे भी, गोविंद जी ने शरीर के दर्द को दरकिनार करते हुए पैरों को आदेश दिया कि बस अब शिकायत ना करना पूरे रास्ते, साइकिल रुकनी नहीं चाहिए, सीट पर बैठे-बैठे पिछवाड़ा ऐसा ही हुआ कि ना बैठा जाए, ना खड़ा हुआ जाए, हालत बद से बदतर होने की स्थिति की और बढ़ती जा रही थी.....
जैसे-जैसे रात बढ़ रही थीं और साथ में दूर-दूर तक उनका कोई साथी नहीं था। ये गाना दिमाग आ रहा है कि नदिया चले चले रे धारा, चन्दा चले चले रे तारा...तुझको चलना होगा... तुझको चलना होगा.... ये हमारे ग्रुप के फिटनेस मोटीवेटर विमल शर्मा जी की फेवरेट लाईन है और गोविंद जी भी बस चलते रहे, मतलब चलते ही रहे..... रुके ही नहीं.....
उनकी इस 400 km राइड के अंतिम भाग में शरीर और दिमाग की जंग जब अपने चरम पर होती है उससे रुबरु होने का मौका मिलेगा। रात का वो मंजर जिसे सोचकर सिहरन सी पैदा हो जाती है। जब बड़े-बड़े ट्रक बराबर से स्पीड से गुजर रहे थे तो साइकिल का डरना लाजिमी था।
पर डर के आगे जीत थी जो नोएडा एक्सटेंशन भी तो एक महान राइडर का बाहें फैलाए इंतजार कर रहा था। मौसम रात में गर्म तो नहीं था पर हिम्मत धीरे-धीरे जवाब दे रही थी, शरीर टूट रहा था, थककर चूर हो गया था.. गोविंद जी ने अपने आपको समझाया कि अगर रेस्ट लिया तो बस गए, फिर कोई उठाने नहीं आयेगा और शायद आप भी फिर अपने को ना उठा पाओ इसलिए रुकने की तो सोचना भी मत..... अभी अभी बस विवेकानंद जी की लाइन याद आ रही है कि उठो खड़े हो और तब तक चलते रहो जब तक मंजिल पर ना पहुँच जाओ.…
शरीर में हो रहे दर्द को दरकिनार करते हुए एक नए जोश और उत्साह के साथ पैरों ने पैडल पर इस तरह उत्साह दिखाया कि सफर मुश्किल से अब 80 km बचा होगा और मेरठ बाईपास खत्म हो चुका था, मोदीनगर की और बढ़े चले जा रहा थे गोविंद जी। जब मैंने पूछा कि इतनी रात में साइक्लिंग की , ब्लिंकर वाली लाइट तो होगी सेफ्टी वाली तो जवाब आया गोबिंद जी का कि अमित जी, तैयारी तो की थी बस ये मान लो कि एग्जाम की तैयारी की हो ITI लेवल की और पेपर देने चले गए IIT का, कई लाइट थी, पर बैटरी डिस्चार्ज हो चुकी थी,
बस अब एक ही बैटरी बची थी उनके पास, वो थी उनके आत्मविश्वास की , जिससे शरीर के अंग चार्ज हो रहे थे। जानकारी बहुत जरूरी है और ये सबक भी नए राइडर्स के लिए, कहीं भी जाना हो और कोई भी काम हो उसकी पूरी प्लानिंग जरूरी है आवश्यक सामान और सेफ्टी से तो बिल्कुल भी समझौता नहीं, गोविंद जी ने शायद इसकी कल्पना नहीं की थी कि सफर ऐसा हो जाएगा।
चलते रहे अंधेरे में ही, सुनसान राहों पर, अच्छा एक बात और है , दिन में कुत्ते शांत रहते है भीड़ रहती है पर रात में कोई बाइक, कोई कार निकलती है तो पता नहीं क्या दुश्मनी निकालते है , भौंकना शुरू, खैर कुत्ते है ये अपना काम करे, मै चलता रहूंगा, साइकिल पर हूं, ज्यादा डरने की बात नहीं थी, और सबसे बड़ा डर तो यही था कि कैसे होगा और देखिए अब हर पैडल मुझे मंजिल के और करीब ले जा रहा है।
रास्ते में मुरादनगर के पास गंग नहर मिली, मन तो हुआ कि रुककर थोड़ा आराम करूं पर ऐसा हो ना सका और शायद गंगा मईया ने भी बोला ही कि बेटा अब बिल्कुल नहीं रुकना, बहुत पास है तेरी मंजिल, ऐसे हिम्मत नहीं हारनी। नई ऊर्जा के साथ गंगा मईया से आशीर्वाद लेते हुए और जीत का वादा करते हुए आगे बढ़े कि होगा कैसे नहीं होगा, वाकई लंबा सफर तय किया था उन्होंने और मंजिल अभी भी लगभग 30 km दूर थी। धीरे-धीरे ही सही पर चलते रहे।
आपको इस बात पर अब कोई अचम्भा नहीं होगा कि रास्ते में एक फ्लाईओवर पार करना था पर उसे पार करने की शक्ति अब उनमें नहीं बची थी तो पैदल ही पार किया। सुबह हो चुकी थी और कुछ लोग मॉर्निंग वॉक पर निकल रहे थे, शायद वो भी सोच रहे होंगे, साइकिल तो है पर अजीब राइडर है , पैदल पता नहीं क्यों जा रहा है इसे लेकर.... जिसका सबसे बेहतरीन जवाब गोविंद जी के पास था और सच कहूं तो ये केवल एक कहानी नहीं है एक ऐसे संघर्ष की दास्ता है जो हम अपने आप से कई बार लड़ते है।
अपने आप से बातें करते करते अब मंजिल का द्वार बहुत नजदीक आ गया था, मन में लाखों भावनाएं एक साथ उमड़ पड़ी, कि देखिए यही तो है वो मंजिल जिसके लिए इतने मुश्किल भरे सफ़र को पार किया है। उस समय उनकी मनोस्थिति का आंकलन कोई भी मनोवैज्ञानिक नहीं कर सकता। वो जीत के लम्हे बड़े भावुक और बेहद खुश करने वाले होते है।
दिल से आपके लिए बस यही शब्द निकल रहे है कि..
अगर टूटने लगे हौसले तो ये याद रखना,
बिना मेहनत के हासिल तख्तों ताज नहीं होते....
ढूंढ लेते है अंधेरे में भी मंजिल अपनी,
क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते....
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं...................
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं...................
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्तों, अभी 3 मेडल और आने है और उनकी स्टोरी भी अगले पार्ट में साझा करूंगा। बस ये देखना है आपके फीडबैक से कि आपको गोविंद जी की ये कहानी लगी कैसी.....
दिल से लिखी इस स्टोरी पर फीडबैक भी दिल से आए तो बाकी बचा हिस्सा भी जल्द लिखूंगा....
अमित सिलावट
मोटीवेशनल ब्लॉगर
जबरदस्त लिखते हो साहब..
ReplyDeleteजबरदस्त अमित जी
Deleteबहुत सुंदर अमित जी, आपकी लेखनी दिलों में जोश भर देती है, मन करता है की अभी उठ कर दोडरना लगू
ReplyDeleteZabardast, unbelievable, keep it up !
ReplyDeleteशुक्रिया आपका सर
Deleteअमित जी, आपने केवल एक ब्लॉग नहीं लिखा, बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की एक जीवंत कहानी हमारे सामने रख दी। पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा जैसे मैं स्वयं गोविंद जी के साथ उस पूरी 400 किमी की यात्रा पर हूँ। आपकी लेखनी हर भावना को जीवंत कर देती है। गोविंद जी को Super Randonneur बनने पर हार्दिक बधाई और आपको इतनी प्रेरणादायक कहानी लिखने के लिए दिल से धन्यवाद। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानियाँ लिखते रहिए। सादर प्रणाम।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका आपके कमेंट के लिए
Deleteबहुत-बहुत धन्यवाद मनीष सर । आपका इतना सुंदर और भावनात्मक फीडबैक पढ़कर बहुत खुशी हुई। यदि इस कहानी ने आपको गोविंद जी की यात्रा का हिस्सा महसूस कराया, तो मेरी लेखनी सफल हुई। आगे के भागों में उनकी यात्रा के और भी प्रेरणादायक पहलू साझा करूंगा। स्नेह और प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार। 🙏
DeleteOutstanding blog, Amit Ji. This did not feel like a story; instead, it felt like watching a biopic while reading the biography. The courage, resilience, and rigor demonstrated by Govind Ji are an example to follow. This is the best blog I have read recently. Keep shining and help deserving people shine through your blogs. More power to you. :)
ReplyDeleteThank you so much, Vaibhav Ji, for your heartfelt words. Your appreciation truly means a lot to me. I'm glad the story could create such an immersive experience. Feedback like yours motivates me to keep documenting inspiring journeys that deserve to be told. Grateful for your encouragement and support. 🙏
Delete