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Showing posts from May, 2020

रूम हीटर और ब्लोअर

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रूम हीटर  और ब्लोअर  दोस्तों, आज मैं  आपके साथ अपने जीवन का एक ऐसा अनोखा किस्सा सांझा  कर रहा हूँ  जिसमे हास्य के साथ एक गहरी शिक्षा भी छिपी है कि  सच्ची दोस्ती मे  छोटी-छोटी बातो का पर्दा होने से दुनिआ किस तरह फायदा उठाती  है। वाक्या  जुड़ा है मेरे खास  दोस्त से ,  जिससे हमारे  पारिवारिक सम्बन्ध थे।  सरकारी कॉलोनी मे  मेरे और उसके घर मे  बस 50 कदम का फैसला था।  5 साल पहले  की बात है , जनवरी के महीने का हड्डिया जमाने वाला ठण्ड का दौर चल रहा था।  ठण्ड से बचने के किये जा रहे सारे इंतजाम नाकाफी लग रहे थे।  पहला सीन  मैं  सपरिवार दोस्त के घर जाता हूँ। ठण्ड  से बचने  के लिए दोस्त ने  एक ब्लोअर खरीदा  था।  दोस्त  ने बताया कि  ये ब्लोअर कल ही तो लेकर आया हूँ।  बहुत ही बढ़िया क़्वालिटी  का है।  रिजल्ट बहुत अच्छा है , पूरा कमरा फटाफट गरम हो जाता है।  भाई ने  उसकी शान  मे  बहुत क...

मेरी पहली मैराथन दौड़

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मेरी पहली मैराथन  दौड़  दो शब्द - जिन्दगी  की किताब मे  मैराथन का एक पन्ना अब  जुड़  चुका  था। मैं  कोई ऐथलीट तो नहीं था, पर  10 किलोमीटर से शुरू  होने वाला ये सफर मैराथन तक कैसे जा पहुँचा, पता नहीं । चार महीने लगे थे इस मिशन को।  इस रोचक कहानी के माध्यम से आप लोगो के साथ दिल की बात शेयर करूँगा । मैराथन की तैयारी के  हर पड़ाव पर रोशनी  डालने का एक छोटा सा प्रयास  है यह कहानी  ।  मुझसे पहले ना  जाने कितने लोग मैराथन दौड़ चुके है और आने वाले समय मे  भी दौड़ते रहेंगे।  पर मेरे  लिए यह मैराथन दौड़ विशेष मायने रखती है।  नई  सोच, नई  ऊर्जा का संचार हुआ है जीवन  मे।  जब आप इसे पढेंगे  तो यकीन मानिये  पूरा पढ़कर रहेंगे ऐसा मेरा मानना  है।  समर्पित - अपनी यह कहानी मैं  उन  गरीब मजदूरों  और  उनके नन्हे प्यारे बच्चों  को समर्पित करता हूँ  जो कोविड  लॉक डाउन के...

रेल और गुमशुदा चश्मा

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आज जब मैं  अतीत के झरोखों  से झांककर देखता हूँ तो एक रेल यात्रा के दौरान गुमशुदा  चश्मे का रोचक वाक्या  तरोताजा हो जाता है कि  किस तरह मैंने  कोशिश करके उसे उसके मालिक तक पहुंचाया था........ऑपरेशन चश्मा को अंजाम देकर  .......... यह बात लगभग 4 साल पुरानी  है।  गर्मियों की  छुट्टियों मे  रिश्तेदार  के यहाँ सपरिवार बैंगलोर  जाने  का प्रोग्राम पहले से तय था। उस दिन हमारी ट्रेन  शाम को लगभग 4 बजे  नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बैंगलोर  के लिए छूटी।  टू  टियर - ऐसी   कोच मे  चार सीटों का पूरा केबिन हमारे पास था। लगभग एक घंटे के बाद फरीदाबाद स्टेशन आ गया। हमारे सामने साइड लोअर सीट पर एक दंपति  आकर बैठ गये। उनकी उम्र लगभग 50  साल रही होगी। औपचारिक अभिवादन के बाद  बाते  सांझा  हुई तो पता चला कि  वो लोग सिरडी साईं  बाबा  के दर्शन करने जा रहे है। उनका खुद का बिज़नेस था और भगवान  मे  गहरी आस्था थी। सीट पर बैठते  ही म...

चींटियो का डॉक्टर

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बचपन की खट्टी- मीठी यादों  मे से एक  घटना यह भी थी जब हम अपने आपको चींटियो का डॉक्टर माना करते थे। बहुत सी नन्हीं  जानें  जो बचाई थी उन नन्हें  हाथो नें............. आज मुझे बचपन की चींटियों वाली घटना याद आ रही हैं जिसे मैं  आपके साथ साँझा करूँगा। जब मैं  लगभग 6  साल का था,  धुंधला -धुंधला याद  आता है कि  ननिहाल मे बच्चों के साथ एक बड़ा ही अजीब खेल खेला। कोलगेट  पाऊडर के खाली  डिब्बे को  ऊपर से खोलकर मकोड़ों की लाइन के पास चप्पल लेकर  बैठ जाना तथा आराम से एक के बाद एक मकोड़े को मारकर  उनकी लाशों  को डब्बे मे  रखते जाना।  डर , अफसोस शब्द  शायद  उस  समय तक हमारे लिए बने  नहीं  थे।  दया की भीख  माँगते वे बेचारे नन्हें  जीव हमारे अन्जाने  खेल की  भेंट  चढ़ जाते। याद है मुझे  कि  कैसे  एक मकौड़े  ने एक बार मेरी ऊँगली मे  काट खाया था और उसकी गर्दन टूटने के बाद भी मेरी ऊँगली मे  लटकी...

चिड़िया का अधूरा परिवार

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बचपन की अनेक घटनायों मे से एक यह घटना मुझे आज जब भी याद आती है तो दुःख होता है उस अन्जान  चिड़िया   के बच्चे को खोने का। शायद उसका कातिल मैं जो था.......... बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र लगभग 10  साल रही होगी।  घर के सामने एक भूसे की बहुत बड़ी दुकान थी वहां पशुओ के लिए हरा चारा भी मिलता था सभी के लिए वो घेर के नाम से जाना जाता था।  बच्चो के खेलने की विशेष जगह का दर्जा मिला हुआ था उस घेर को। उस समय गौरैय्या चिड़िया हमारी जिन्दगी मे  शामिल थी। छत पर सुखाने  के लिए रखे गेंहूँ को खाने सैकड़ो चिड़िया आ जाया करती थी। अटखेलियाँ करती वो प्यारी चिड़िया ना जाने आज कहाँ खो गयी।  एक बार मैं घेर मे भूसे के साथ खेल रहा था तभी अचानक एक चिड़िया का छोटा बच्चा ऊपर दीवारों मे बनाये गए घोसले मे  से भूसे के ढेर मे गिर पड़ा। लगभग 15 फ़ीट की ऊंचाई  से गिरे उस नवजात बच्चे को वापिस घोसले मे  पहुँचाना मुझ जैसे बच्चे  के लिए असंभव से भी बड़ी बात थी।                          ...