रेल और गुमशुदा चश्मा


आज जब मैं  अतीत के झरोखों  से झांककर देखता हूँ तो एक रेल यात्रा के दौरान गुमशुदा  चश्मे का रोचक वाक्या  तरोताजा हो जाता है कि  किस तरह मैंने  कोशिश करके उसे उसके मालिक तक पहुंचाया था........ऑपरेशन चश्मा को अंजाम देकर  ..........



यह बात लगभग 4 साल पुरानी  है।  गर्मियों की  छुट्टियों मे  रिश्तेदार  के यहाँ सपरिवार बैंगलोर  जाने  का प्रोग्राम पहले से तय था। उस दिन हमारी ट्रेन  शाम को लगभग 4 बजे  नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बैंगलोर  के लिए छूटी।  टू  टियर - ऐसी   कोच मे  चार सीटों का पूरा केबिन हमारे पास था। लगभग एक घंटे के बाद फरीदाबाद स्टेशन आ गया। हमारे सामने साइड लोअर सीट पर एक दंपति  आकर बैठ गये। उनकी उम्र लगभग 50  साल रही होगी।

औपचारिक अभिवादन के बाद  बाते  सांझा  हुई तो पता चला कि  वो लोग सिरडी साईं  बाबा  के दर्शन करने जा रहे है। उनका खुद का बिज़नेस था और भगवान  मे  गहरी आस्था थी। सीट पर बैठते  ही मैंने  महसूस किया था कि  वो थोड़ा  परेशान  थे। उन्होने बताया कि  उनके पास  एक ही सीट है दूसरी वेटिंग मे  है, टीटी ने साफ़ मना कर दिया था कि  कोई सीट नहीं है।  मेरा छोटा बेटा  उस समय 7 साल का था तो मै बोला - परेशान न होइए , बेटाअपनी मम्मी के पास आराम से सो जायेगा।  आप एक हमारी सीट ले लेना।  वो कहने लगे नेक काम पर निकले है, देखो सीट भी भगवान ने दिलवा दी।


                                  टू  टियर ऐसी  कोच के अंदर का दर्शय 

उनका स्टेशन अगले दिन दोपहर तीन बजे  के करीब आना था। सफर मे बच्चों के साथ हँसते- खेलते ताश के खेल का लुत्फ़  उठाते  काफी घुल मिल गए थे हम सब।  समय बीता  और उनकी मंजिल भी आ गयी।  उन्हे विदा करने के बाद हमारी ट्रेन फिर अपनी मंजिल की और बढ़ चली।


अगले दिन सुबह उठे तो पता चला कि  बस थोड़ी ही देर मे  बैंगलोर  स्टेशन आने वाला है।  तभी अचानक मेरा 11 साल का बड़ा बेटा सामने  की सीट पर पड़ा एक चश्मा  लेकर बोला - पापा ये किसका चश्मा  है। मैने उसे देखा और मुझे भरोसा हो गया कि  हो न हो ,ये उन्ही फरीदाबाद वाले सज्जन का चश्मा  है क्योँकि उनके बाद  उस सीट पर कोई नहीं आया था। हाथ मे  चश्मा  लेकर सोचने लगा कि  आखिर क्या कर सकते है अब। श्रीमती कहने लगी ये किसी काम का नहीं , छोड़ दो इससे यही पर।


                                               रिजर्वेशन चार्ट मे  यात्री का नाम देखते टी टी 

पर  मन नहीं माना , एक विचार मन मे  आया तथा अब स्टेशन आने मे  बस 5 मिनट बाकी  थे। बिना देर किये मैं  टी टी के पास गया जो बस उतरने की तैयारी मे  थे और रिजर्वेशन चार्ट रोल करके हाथो मे  पकड़े थे। मैंने  उनसे अनुरोध किया कि मेरे केबिन के सामने जो यात्री थे उनका कुछ सामान छूट गया है, चार्ट मे  देखकर उनका नाम बता दीजिये। टी टी ने मुझे उनका नाम बता दिया जिसमे सरनेम भी लगा था।  अगर शायद  मैं एक मिनट भी लेट होता  तो मुझे उनका नाम ना  मिल पाता। अब उस गुमनाम चश्मे को उसके मालिक का नाम मिल गया था , पर मिशन तो अभी शुरू होना बाकी  था।


बैंगलोर स्टेशन उतरने के बाद जब हम लोग रिश्तेदार  के यहाँ पहुँचे तो मैं  सब कुछ भूलकर मिशन चश्मे  को अंजाम देने मे  लग गया।  मुझे यकीन था कि  टेक्नोलॉजी के इस दौर मे यह काम मुश्किल नहीं। फेसबुक पर उनके नाम सरनाम से खोज शुरू की , पर उस दिन कुछ हाथ नहीं लगा। अगले दिन जब मैं  फेसबुक पर ढूंढ रहा था तो अचानक ही उनके बेटे की प्रोफाइल मे  मैने उन दोनों को पहचान लिया।  कोई मोबाइल नंबर न मिलने पर मैने सारी  बात बताते हुए एक मैसेज किया और उनके पापा का मोबाइल नंबर माँगा।  वहां से कोई जवाब नहीं आया और वो दिन भी बीत गया पर उम्मीद थी कि  उनका बेटा जवाब देगा।


प्रयासो की कड़ी के तीसरे दिन जब मैं  उनके बारे मे  सर्च कर रहा था तो अचानक मुझे गूगल मे एक ऐसा लिंक मिला जिससे उनकी कंपनी  की जानकारी उनका फोटो और मोबाइल नंबर मिल गया।  पर ये कितना सही था ये तो फ़ोन करके ही पता चलता।  उम्मीद की किरण जो जागी  थी वो बिल्कुल  सही थी।  फ़ोन किया तो उन्ही श्रीमान ने फ़ोन उठाया। मैने झट से पुछा- भाईसाहब ! दर्शन हो गए सिरडी बाबा के।  बोले हो गये , पर आप कौन ! जब मैने अपना परिचय दिया और चश्मे  वाली बात बताई तो वे बेहद खुश  हुए और आश्चर्चयकित होकर पूछने लगे कि  कैसे मिला आपको मेरा नंबर।  जब मैने उनको पूरी कहानी बताई तो उन्हे बिल्कुल  विश्वास  ही नहीं हुआ कि  कोई भला एक चश्मे के लिए उन्हे क्यों खोजेगा और वो भी कैसे।


उनसे मैने  घर का पता लेकर चश्मा  कॉरियर  से उनके पास भेज दिया।  जब उन्हे चश्मा  मिला तो उन्होने मुझे फ़ोन करके बहुत धन्यवाद दिया तथा साथ ही फरीदाबाद आने का न्यौता  दिया। उस बुलावे मे  ना  जाने क्यों एक अजीब सा अपनापन था।  जा तो नहीं पाया कभी उनसे मिलने , पर आज भी जब उस घटना की याद आती है तो मेरे रेलयात्रा  के सुखद अनुभवों मे  से एक सुनहरा अध्याय तरोताजा हो जाता है।


देखा जाये तो बात शायद उस चश्मे की नहीं थी और न ही उसकी कीमत की।  पर जब हमारी कोई खोयी हुई वस्तु अप्रत्याशित रूप से मिल जाये जिसके मिलने की सम्भावना ना के बराबर हो तो खुशी  होना लाजमी है। मन से आवाज आई - भगवान  पर भरोसा रखने वाले  का आखिर नुकसान  कैसे हो सकता है........

अमित सिलावट 

Comments

  1. आप बहुत अच्छा लिखते हैं ...आप के ब्ल़ॉग पर आकर अच्छा लगा...शुभकामनाएं. सुंदर विचार ... अनुकरणीय एवं प्रेरणात्मक...साधुवाद ...

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    1. I m blessed with Ur kind appreciation. Thanks sir

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  2. Nice friend .....your blog is amazing
    Thanks......

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  3. अमितजी आपने बहुत अच्छा लिखा । आपको मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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