चींटियो का डॉक्टर

बचपन की खट्टी- मीठी यादों  मे से एक  घटना यह भी थी जब हम अपने आपको चींटियो का डॉक्टर माना करते थे। बहुत सी नन्हीं  जानें  जो बचाई थी उन नन्हें  हाथो नें.............
आज मुझे बचपन की चींटियों वाली घटना याद आ रही हैं जिसे मैं  आपके साथ साँझा करूँगा। जब मैं  लगभग 6  साल का था,  धुंधला -धुंधला याद  आता है कि  ननिहाल मे बच्चों के साथ एक बड़ा ही अजीब खेल खेला।
कोलगेट  पाऊडर के खाली  डिब्बे को  ऊपर से खोलकर मकोड़ों की लाइन के पास चप्पल लेकर  बैठ जाना तथा आराम से एक के बाद एक मकोड़े को मारकर  उनकी लाशों  को डब्बे मे  रखते जाना। 




डर , अफसोस शब्द  शायद  उस  समय तक हमारे लिए बने  नहीं  थे।  दया की भीख  माँगते वे बेचारे नन्हें  जीव हमारे अन्जाने  खेल की  भेंट  चढ़ जाते। याद है मुझे  कि  कैसे  एक मकौड़े  ने एक बार मेरी ऊँगली मे  काट खाया था और उसकी गर्दन टूटने के बाद भी मेरी ऊँगली मे  लटकी रही।  लगता है शायद  उसके बाद ही ये शरारते कम हुई होंगी। 

खैर , बात शुरू  होती है जब मैं  लगभग 12 साल का था। स्कूल से आने के बाद अक्सर मुझे बाथरूम के बाहर  रखी पानी की बाल्टी मे चींटियों की तैरती लाशे  दिख जाया करती थी। अपना बैग फटाफट रखने के बाद हम मिशन चींटी  को अंजाम देने के लिए जुट जाया करते थे। 

                                                            बाल्टी मे तैरती चींटीओं की लाशे 



सबसे पहले देखा जाता था कि  उन लाशों  मे हम किसको ज़िन्दगी का तोहफ़ा दे सकते है। उनमे से एक चींटी को अपनी ऊँगली पर उठाकर चारो ओर  बारीक़ी से देखते थे।  इतने छोटे जीव का पेट पानी भरने से फूल चुका  होता था।  मौत उसके सामने खड़ी होती  थी। उँगलियो के स्पर्श से शरीर पर लगा पानी कुछ ही मिनटों  मे  धीरे-धीरे सूख  जाता था। उसके बाद एक हाथ से दूसरे हाथ की उँगलियों  पर ले जाने का काम होता था। 


कुछ समय के बाद जब उसकी टाँगों  मे  हल्की -हल्की  हरकते  होती तो जिन्दगी  के ये इशारे इतने सुंदर  लगते कि  मानो  कायनात के शब्द भी कम पड़  जाये उस खुशी  को बयां करने मे। ऐसा लगता था कि  किसी बहुत बड़े डॉक्टर ने गम्भीर  रोग के मरीज को मौत के चंगुल से निकाल लिया हो।  उन दिनों के हमारे इस डॉक्टरी पेशे से आज भी  हमारी छाती गर्व से चौड़ी  हो जाती  हैं । 

धीरे -धीरे उस चींटी के शरीर के सभी अंग काम करने लगते थे। मुश्किल  से अपने पैरों  पर खड़ी होकर जब वो अपने दो नन्हें- नन्हें  हाथो को क्रॉस करके मुँह खुजलाती तो गजब का सीन होता था वो। एक अजीब सा रिश्ता था वो , बिल्कुल  डॉक्टर और मरीज जैसा उस दौर मे बिना दवाई , बिना दर्द केवल स्पर्श टेक्नोलॉजी की मदद से बहुत सी  नन्हीं  चींटियो  की जान बचाई थी मैने। 

हाथों  मे  चारों  ओर  घुमाकर उसकी अच्छी  तरह से जाँच पड़ताल करना हमारी चिकित्सा पद्धति  की विशेषता हुआ करती थी। सब कुछ ठीक पाये जाने पर  निर्णय लिया जाता था उसे चींटियो की  लाइन मे छोड़ने का। हाथ से उतरकर  जब वो चींटियो  की लाइन मे  जाकर मिलती थी तो ऐसा लगता था कि  एक नन्हें  डॉक्टर ने मौत के दरवाजे पर खड़े मरीज को ठीक करके उसके परिवार मे दोबारा मिला दिया हो।  

                                                       इसी लाइन का हिस्सा बन गयी थी 


हम अपने आप को किसी हीरो से कम नहीं समझते थे।  बिल्क़ुल  ऐसा मानो  जैसे कोई मिल गया फिल्म मे रितिक रोशन ने जादू  को वापिस उसकी दुनिआ मे  भेज दिया हो। प्यार से अलविदा कहकर अगली चींटियों को बचाने के काम मे  उसी शिद्दत के साथ लग जाया करते थे। बचपन के कितने प्यारे दिन थे वो डॉक्टर वाले .......
                                                                                                                               
                                                                                                                                    अमित सिलावट 

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