साइकिल की जुबानी
*साइकिल की जुबानी*
अक्सर सुबह सोसायटी से निकलते समय उन धूलचढ़ी साइकिलों से मन ही मन कुछ बातें कर लेता हूं , अगर बोलती तो बताती बेचारी कि हां मैं वो ही तो हूं जिसके लिए उस बच्चे ने दिन रात जिद्द की थी और पापा मम्मी ने भी तो बडे़ चाव से दिलवाई थी, पर आज मेरी सुध लेने वाला वो बच्चा मोबाइल गेम की मायावी दुनिया में कही गुम हो गया है और मुझे भूल गया है।
अपना समय याद करते है तो 1990 की बात रही होगी , 50 पैसे में आधा घंटा छोटी साइकिल किराए पर लेकर शान से बाजार में चलाया करते थे और जब 2 मिनिट बचते तो दुकान के सामने ऐसे छाती चौड़ी करके निकलते कि बस एक बार दुकानदार बोलें तो सही, और हम कहें कि अभी टाइम है। पापा के ड्यूटी से आने के बाद साइकिल के मालिक बस हम हो जाते थे। क्रंची स्टाइल से गद्दी तक का बड़ा सफर मजेदार रहा। पहली बार जब सीट पर बैठकर साइकिल चलाई तो यकीन मानिए कि ऐसा लगा मानो राफेल ही उड़ाकर आए हो।
ये बेचारी साइकिल इंतजार करती है कि शायद इनका राइडर एक दिन बाहर निकलेगा और मुझे भी चमकाकर फिर से उस दुनिया को दिखाएगा जिसे देखे एक जमाना हो गया.....
वैसे भी ,जिन्दगी साइकिल चलाने के जैसे है : जब तक आप पैडल मारना बंद न कर दें, तब तक आप गिरते नहीं है।
Comments
Post a Comment