अरुणिमा सिन्हा - साहस का दूसरा नाम
अरुणिमा सिन्हा - साहस का दूसरा नाम

दो शब्द -
सोचा तो कई बार इस महान नाम के बारे मे आपसे कुछ मन की बातें साँझा करुँ , समय बीत रहा था और इस नाम के बारे में अपने विचार रखने की इच्छा भी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी। आज दिल और कलम दोनों तैयार है आपको इस नाम से और इसके अद्भुत साहसी काम से रूबरू कराने की | भारत माता की इस परमवीर बेटी के हौसलों और चट्टान से भी बुलंद इरादों के आगे विश्व मे सबसे ऊंचे हिमालय पर्वत ने भी शीश झुकाया है।बड़े ही गर्व की बात है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर चढ़ाई करने वाली पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही बनने का इतिहास भारत की इस बेटी अरुणिमा के नाम लिखा गया है।
मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से एक प्रयास करने की छोटी सी कोशिश करूँगा कि अगर आप इस नाम से परिचित नहीं है तो आप इसे जिंदगी भर नहीं भूलेंगे और अगर इसके बारे मे परिचित होंगे तो आपको लगेगा कि ऐसी महान भारत की साहसी बेटी के बारे मे इतना कम क्यों पता था।
आत्मविश्वास को एक नयी परिभाषा देता यह नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। मेरी जिंदगी मे यह नाम सबसे पहले अप्रैल 2011 को पेपर पढ़ते हुए आया जब पता चला कि एक महिला खिलाडी का पैर बरेली रेलवे स्टेशन के पास ट्रैन एक्सीडेंट मे कट गया है। खबर तो सामान्य ही लगी थी तो भूल जाना लाजिमी था। लगभग दो साल बाद मई 2013 में न्यूज़ पढ़ी कि रेलवे स्टेशन पर एक्सीडेंट मे अपना पैर खोने वाली उस महिला खिलाडी ने अपाहिज होकर भी हिमालय पर्वत की चोटी पर फतेह हासिल कर ली और ऐसा कारनामा करने वाली वह वर्ल्ड मे पहली महिला थी तो एक बार को लगा , कैसे.... भला कैसे ..... केवल दो साल के समय मे इतना बड़ा और साहसी काम..... भला कैसे किया जा सकता है।
बहुत मुश्किल हालातों मे उम्मीद की किरण का ऐसा जीता जागता उदाहरण मैने अभी तक नहीं देखा था तभी तुरंत उस न्यूज़ को पेपर से काटकर दीवार पर चिपका दिया था ताकि आते जाते समय इस खबर पर नजर पड़ती रहे। लीक से हटकर आयी इस खबर का इसी तरह सम्मान किया था मैने। समय बीतता गया और अरुणिमा के बारे में जानने की इच्छा भी तेज होती गयी।
उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर अंबेडकर नगर की रहने वाली अरुणिमा सिन्हा पैर नकली होने के बावजूद दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी-एवरेस्ट को फतह करने वाली विश्व की पहली महिला पर्वतारोही अरुणिमा कठिन और विषम परिस्थितियों को जीतकर उस मुकाम पर पहुंची हैं जहां पहुंचना किसी भी पर्वतरारोही का सपना होता है।
भारत की यह वीर बेटी इन चोटियों पर लहरा चुकी हैं तिरंगा अब तक वो एवरेस्ट (एशिया), किलिमंजारो (अफ्रीका ), एल्प्स ( यूरोप) , कोसीउज्को (ऑस्ट्रेलिया), एकॉन्कागुआ (अर्जेंटीना), कार्सटेन्स्ज पिरामिड (इंडोनेशिया) की चोटी पर भी तिरंगा लहरा चुकी हैं।
भारत की बेटी डॉक्टर अरुणिमा सिन्हा (Arunima Sinha) ने अंटार्कटिका के सबसे ऊंचे शिखर माउंट विन्सन पर भी तिरंगा लहरा दिया। अरुणिमा ऐसा करने वाली दुनिया की पहली दिव्यांग महिला बन गई हैं।
तो चलिए शुरू करता हूँ रोंगटे खड़े कर देने वाली और बेहद ही साहसिक डॉक्टर अरुणिमा सिन्हा की कहानी .........
अरुणिमा के लिए ये चार लाइन याद आ रही है ....
जब टूटने लगे हौसले तो यह याद रखना ....
बिना मेहनत के हासिल तख्तो ताज नहीं होते।
ढूंढ लेना अँधेरे मे ही मंजिल अपनी ....
क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते।
23 साल की राष्ट्रीय बॉलीबाल खिलाडी अरुणिमा अप्रैल 2011 को लखनऊ से दिल्ली से ट्रेन के जनरल कम्पार्टमेंट में सफर कर रही थी। बरेली के नजदीक चलती ट्रेन मे 4 -5 बदमाशों ने उनके गले मे पड़ी सोने की चेन लूटने की कोशिश की। लोग तो और भी थे उस डब्बे मे, पर बदमाशों की दबंगई के आगे किसी ने विरोध नहीं किया।
इस मुश्किल घडी मे अरुणिमा ने उन बदमाशों से न केवल लोहा लिया बल्कि उन बदमाशो के पैर उखाड़ दिये। एक लड़की के इतने साहसी और अप्रत्याशित विरोध से वो बदमाश घबरा गए और उन्होने उसे ट्रेन से बाहर फेंक दिया। दूसरे ट्रैक पर भी एक ट्रेन आ रही थी। पहले वो दूसरी ट्रेन से टकराई और फिर नीचे गिर गयी , ट्रेन के जाने के बाद जब उसने उठने की कोशिश की तो देखा कि उसका एक पैर कट चुका था जो उसकी जीन्स मे अटका पड़ा था और बस खून ही खून बह रहा था और दूसरे पैर की हड्डियां टूट-टूटकर बाहर निकल रही थी।
पूरी रात वो चिल्लाती रही , पर मदद को कोई नहीं आया। चिल्लाते-चिल्लाते शरीर की ताकत भी कम होती गयी और फिर धीरे - धीरे दिखाई देना भी बंद हो गया। वो देख पा रही थी कि कैसे रेलवे स्टेशन पर चूहे उसके कटे पैर को कुतर रहे थे, पर मजबूर थी क्योंकि शरीर और दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था । ज्यादा खून बहने से वो मानो बेहोश ही हो चुकी थी। 49 ट्रेने आयी गयी। हर गुजरती ट्रेन से होने वाले कम्पन से केवल ट्रैक ही नहीं कांप रहे थे बल्कि उसकी अंतर आत्मा भी काँप रही थी। पर भगवान् ने जिसे इतिहास रचने के लिए गढ़ा हो वो भला रेलवे ट्रैक पर दम कैसे तोड़ सकती थी। सुबह जब गाँव वालो ने उसे देखा तो तुरंत बरेली डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल उत्तर प्रदेश मे एडमिट कराया।
अरुणिमा फर्मसिस्ट और डॉक्टर की बात सुन रही थी। पता चला कि उनके पास ब्लड नहीं है , एनेस्थीसिया नहीं है ,इलाज शुरू हो तो कैसे। बड़ी हिम्मत करके अरुणिमा बोली, डॉक्टर साहब जब मेरा पूरा पैर कटा जब मैने उस दर्द को बर्दाश्त कर लिया और अभी तक जिन्दा हूँ , अब तो आप मेरे भले के लिए ही तो पैर काट रहे हैं, काट दीजिये बिना एनेस्थीसिया के। उसकी ऐसी बात सुनकर डॉक्टर भी चकित रह गए। ऐसा साहस इतनी हिम्मत वाला पहला मरीज अपनी जिंदगी मे देख रहे थे। उस लड़की की हिम्मत का सम्मान करते हुए डॉक्टर और फार्मासिस्ट ने अपना 1 -1 यूनिट ब्लड देकर पैर को बिना एनेस्थीसिया ही अलग कर दिया। इस वाकया से ही इस फौलादी लड़की के हिम्मत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
जब यह खबर मीडिया तक पहुंची कि अरुणिमा नेशनल प्लेयर है तो तुरंत उसे KGMC लखनऊ मे भर्ती कराया गया और उसके बाद लगभग 4 महीने AIIMS ट्रामा सेंटर दिल्ली मे इलाज चला। 25 दिनों बाद अरुणिमा कुछ ठीक हुई तो न्यूज़ पेपर से पता चला कि टिकट न होने के कारण वो ट्रेन से कूद गयी थी। जब उसके परिवार ने इस बात का खंडन किया तो मीडिया ने सुसाइड का एंगल लोगो के सामने रख दिया। जिस परिवार की जवान लड़की जिसका एक पैर कट चुका हो, दूसरे पैर की हड्डिया टूटी पड़ी हो , स्पाइन में 3 फ्रैक्चर आये हो , आगे का भविष्य पता न हो , शायद जिंदगी में दोबारा चल भी पाए या नहीं। उसकी मनोस्थिति का आंकलन करना भी कठिन है।
पर वो कहते है ना --- जंहा चाह , वहां राह। हॉस्पिटल के बेड पर इस हिम्मती लड़की ने कुछ ऐसा करने की ठानी जिसे सोचकर भी एक आम इंसान घबरा जाये। दिलो दिमाग और अंतरात्मा से प्रण लिया कि अब तो सबसे मुश्किल काम करना है और फिर एवरेस्ट फतेह करने का सपना बुन लिया। पर उस ख्वाब को पूरा करने के लिए गाइडेंस ,ट्रेनिंग, स्पॉन्सरशिप जरूरी थी क्योकि इस मिशन में 40 -50 लाख का खर्चा आना तय था जबकि इतना सारा पैसा तो उसने देखा भी नहीं था।
अरुणिमा जिसको बताती सब हॅसते और उसे पागल कहते । रिश्तेदार कहते- अरुणिमा तेरा दिमाग ख़राब हो गया है तुम इस काम को कभी नहीं कर पाओगी। एक पैर आर्टीफिशल , दूसरे मे रॉड और स्पाइन मे फ्रैक्चर। चुपचाप कोई नौकरी करना और आगे बचा जीवन बिताना और क्या कर सकती हो तुम। अरुणिमा सोचने लगी कि वास्तव मे लोग शरीर ही तो देख पाते है , पर अपने मन के ज्वालामुखी को केवल वो ही देख पा रही थी और कोई नहीं।
मंजिल मिल ही जायेगी, भटकते ही सही
गुमराह तो वो है, जो घर से निकले ही नहीं
उसके भाईसाहब ने कुछ मदद की और बताया क्यों न बछेंद्री पाल मैडम से मिला जाये जिन्होने 1984 मे ऐवरेस्ट पर फतह की थी। एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली वो पहली भारतीय महिला थी। हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद घर जाने के बजाय ट्रेन के दिव्यांग डिब्बे मे बैठकर अरुणिमा सीधे बछेंद्री मैडम के पास जाने की लिए निकल पड़ी । जिस ट्रेन के हादसे ने उसके जीवन मे जो दर्द दिया था वो ट्रेन ही आज उत्साह, उमंग के साथ उसे एक नए सफर की और लिए दौड़ी जा रही थी।
ऐसी हालत मे इतना बड़ा और मुश्किल भरा फैसला लेने वाली लड़की के मुँह से एवरेस्ट फ़तेह करने की बात सुनकर बछेंद्री मैडम की आँखे छलक उठी। मैडम बोली देख अरुणिमा ऐसी हालत में तूने सोचा और घर पर आराम करने के बजाय अपने हरे जख्मों के साथ भी इस मिशन पर निकल पड़ी, ये समझ कि एवरेस्ट तो तूने मन मे फ़तेह कर लिया है, अब तो बस लोगो को दिखाने के लिए ही तो चढ़ना है लेकिन तुम्हे अपने आपको साबित करने के लिए पूरी प्लानिंग करनी होगी क्योंकि असली चुनौतियाँ तो फील्ड में ही सामने आती है।
धरातल पर जब मिशन एवरेस्ट की तैयारी चलने लगी तो अरुणिमा को पता चला कि रोड हैड से बेस कैम्प तक जाने में ट्रेनिंग लेने वाले पर्वतारोहियों को जंहा 2 मिनट का समय लगता वही अरुणिमा को वही दूरी तय करने मे 3 घंटे का समय लग जाता। लगे भी क्यों न , क्योंकि सीधे पैर की हड्डियां अभी जुडी कहाँ थी और बाएं पैर के जख्म अभी भी हरे थे, जिन्हे थोड़ा सा दबाने पर ही खून निकलने लगता। जब भी साथी लोगो के साथ किसी चोटी पर जाती तो साथी कहते कि अरुणिमा धीरे-धीरे आना ... ये शब्द काँटे की तरह उसके दिल को चीर जाते। अब उसे भी लगने लगा था कि एवरेस्ट फतेह करना इस तरीके से तो संभव नहीं।
8 महीनों के लगातार अथक प्रयासो और सतत अभ्यासों से एक दिन वो भी आ ही गया कि जब पूरा सामान उठाने के बाद भी अरुणिमा पहाड़ की चोटी पर सबसे पहले पहुँच जाती। साथी भी कहते कि पैर नहीं है फिर भी कैसे चल लेती हो। सफर यूँ ही चलता रहा और फिर स्पोंसरशिप भी मिल ही गयी। अब तो मानो जैसे पंख लग गये हो।
पर मुश्किलें तो बाहें फैलाये अरुणिमा का इन्तजार कर रही थी। पहली दिक्कत तो ये ही थी कि शेरपा को तैयार करना। जब शेरपा को पता चलता तो वो एक पैर मे रॉड , दूसरा आर्टिफिशल तो वे कदम पीछे हटा लेते। बड़ी मुश्किल से एक शेरपा को तैयार किया।
वो दिन भी आखिर आ ही गया जिसका अरुणिमा को बेसब्री से इन्तजार था। एवेरस्ट मिशन मे उसके साथ 6 लोगो का ग्रुप था। चढ़ाई के रॉकी एरिया मे वो सबसे आगे थी पर उसके बाद उसके बांए पैर मे दर्द होना शुरू हो गया और आर्टिफिशल पैर मूव हो गया। ऐसे मुश्किल भरे समय मे भी उसने बस साथियों से ये ही कहा कि ये मेरा पैर है , और मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि इसे कैसे चलना है। हौंसलो को और बुलन्द करके वो फिर हिमालय को फ़तेह करने आगे बढ़ जाती।
एवरेस्ट समिट करने के मिशन मे बड़े बड़े दिग्गज पर्वतारोहियों के हौसले तब धरे के धरे रह जाते है जब अपने सामने किसी को मरता हुआ देखते है क्योंकि जिस मिशन के लिए वो जा रहे है, उसी मिशन मे ये मर रहा है। ज्यादा से ज्यादा चढ़ाई पर्वतारोही रात के समय करते है क्योंकि मौसम साफ़ और शांत होता है। रास्ते मे अरुणिमा को कई डेड बॉडीज दिखाई दी और देखा कि एक बंगलादेशी बस मौत के दरवाजे पर ही खड़ा है, उसके मुँह से बस आह... आह.... ही आवाज आ रही थी। अरुणिमा के दिमाग मे अपना ट्रेन हादसा ताजा हो गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले और वो लगभग 15 मिनट वही खड़ी रही। उसके बाद उसने अंतिम साँसे ले रहे बांग्लादेशी से कहा कि अगर आप लोगो ने एवरेस्ट समिट नहीं किया तो आप लोगो के लिए भी मै एवरेस्ट फ़तेह करुँगी और जिन्दा वापिस जाऊंगी।
मानसिक शक्ति एक अद्रश्य शक्ति है। हम जो सोचते है यदि हमारा दिमाग उससे सहमत हो जाता है तो शरीर भी दिमाग का साथ देने को तैयार हो जाता है फिर वो चाहे लक्ष्य कितना भी बड़ा क्यों न हो मंजिल मिल ही जाती है । रास्ते मे पड़ी लाशों के ऊपर से होकर जाना ही एकमात्र रास्ता था। सारी मुश्किलों को चीरती हुई अरुणिमा आगे ही बढ़ती रही।
एवेरस्ट समिट से पहला स्टॉप हिलेरी स्टेप है। हिलेरी स्टेप पर पहुंचने के बाद शेरपा बोला- अरुणिमा वापिस चलना होगा क्योंकि तुम्हारी ऑक्सीजन कभी भी खत्म हो सकती है , जिन्दगी रही तो दुबारा एवेरस्ट समिट कर लेना। अरुणिमा शेरपा से बोली - क्या बोल रहे हो भाई , मुझे हर हाल मे एवरेस्ट समिट करना ही है। क्योंकि अरुणिमा जानती थी कि स्पोंसरशिप दुबारा नहीं मिलेगी और ऐसा मौका भी । जिन्दगी मे भी कई बार ऐसे मोड़ आते है जब फैसला खुद को ही करना पड़ता है।
अगर वो चाहती तो वो वापिस जा सकती थी, उससे पूछने वाला कोई नहीं था ,उसे तो बस ये ही तो बोलना था कि ऑक्सीजन खत्म हो गयी इसीलिए वापिस आ गयी। पर इस हिम्मती लड़की की डिक्शनरी मे हार नाम का तो शब्द ही नहीं था। एक एक कदम रखकर इस मंजिल के इतने करीब पहुंचकर वापिस जाना उसे मंजूर न था। किसी तरह शेरपा को समझा बुझाकर आगे चलने के लिए मना ही लिया और अपनी मंजिल को चूमने और विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए उसके उत्साहित कदम चल पड़े। एक से डेढ़ घंटे की चढ़ाई के बाद आखिरकार उसने सुबह 10 :55 पर एवरेस्ट समिट कर ही लिया। 11 बजे के बाद एवरेस्ट समिट करना सुसाइड अटेम्पट कहा जाता हैं। वाकई इतिहास रच गया था उस दिन आज अरुणिमा का ही दिन था।
एक फिल्म का ये डायलाग बिल्कुल फिट बैठता है -
अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की साजिश मे लग जाती है
वर्ल्ड की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े होकर अरुणिमा का जोर-जोर से चिल्लाने का मन कर रहा था और वो सबको बताना चाहती थी कि देखिये आज मे टॉप ऑफ़ दा वर्ल्ड हूँ। एवरेस्ट पर फ़तेह करके अपना सपना साकार करने की इस परम खुशी के वो असीम पल अरुणिमा के लिए तो खास थे ही , साथ ही साथ भारत की इस वीर बेटी ने भारत को ही नहीं पूरे विश्व को एक सन्देश दिया है कि ठान लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।
रेलवे ट्रैक पर खून से लथपथ पड़ी उस मजबूर लड़की और एवरेस्ट पर तिरंगा लिए संसार की सबसे ऊँची चोटी पर खड़ी मजबूत लड़की ने जिस साहस का परिचय दिया उसकी जितनी भी तारीफ की जाये, कम ही होंगी। जीत की इस ख़ुशी से उसकी आँखों मे आँसु आ गए। एक खिलाडी की उस समय की भावना को शब्दो का रूप शायद दिया नहीं जा सकता। आँसुओ और अपनी भावनाओ को कण्ट्रोल करते हुए शेरपा से कुछ फोटो खिचवाये।
जब उसने शेरपा से कहा कि भाई मेरी वीडियो भी बना ले तो शेरपा बहुत गुस्सा हो गया क्योंकि ऑक्सीजन खत्म होने वाली थी और वहां पर ज्यादा देर रुकना खतरनाक था। दुबारा समझा बुझाकर अरुणिमा ने उसे तैयार कर लिया। कैमरा के 4 -5 सेट सेल अरुणिमा साथ ले गई थी ताकि इस पल को कैद करने मे कोई दिक्कत न हो।
जेहन मे ये बात आना लाजमी है कि भला एक तो लड़की, ऊपर से दिव्यांग....उसे ऐसा रिस्क लेने की जरूरत ही क्या थी। अरुणिमा बताती है कि उस समय उनके दिमाग मे कही न कही ये चल रहा था की शायद अब वो जिन्दा वापिस ना जा पाए। उसने शेरपा से कहा कि अगर मैं जिन्दा भारत न जा सकूँ तो ये वीडियो मेरे भारत भिजवा देना ताकि मेरे देश को युवाओ को ये सन्देश जाये कि कुछ भी मुमकिन है बस इरादा जीत का होना चाहिए। 11 अप्रैल 2011 को अरुणिमा का एक्सीडेंट हुआ और 21 मई 2013 को वो टॉप ऑफ़ दा वर्ल्ड थी। एवरेस्ट फतह करना उसकी जिद, एक जूनून बन चुका था , उसकी जिंदगी बन चुका था। सोते-जागते, उठते -बैठते बस उसे एवरेस्ट ही दिखाई देता था। जब किसी काम को करने मे इतना समर्पण जो तो भला जीत मिले भी तो क्यों ना।
एवरेस्ट समिट के बाद वापिसी
एवरेस्ट मिशन मे ज्यादा से ज्यादा मौते नीचे आते समय ही होती है। थोड़ी ही नीचे उतरे थे तो पता चला कि उसकी ऑक्सीजन खत्म। शेरपा कहने लगा कि मुझे वाकई उम्मीद नहीं थी कि तुम एवरेस्ट समिट कर पाओगी। ऑक्सीजन की कमी से अब उसके शरीर ने काम करना बंद कर दिया था। वो चाहकर भी अपने शरीर को हिला नहीं पा रही थी। बस उसके दिमाग मे ये ही बात चल रही थी कि जब मै रेलवे ट्रैक पर 7 घंटे बेहोशी ही हालत में पड़ी रही और 49 ट्रेनें गुजरी तब भी मै बची रही तो भगवान मुझे ऐसे नहीं मरने दे सकता।
इससे महज एक संयोग माने या कुछ चमत्कार जो भी हो भगवान भी उन्ही की मदद करते है जिसमे जीतने का जज्बा हो। एक ब्रिटिश क्लाइंबर दो ऑक्सीजन सिलिंडर लिए ऊपर जा रहा था। वजन ज्यादा होने के कारण शायद उसने अपना एक सिलिंडर वही छोड दिया। शेरपा दौड़ कर गया और उसने वो सिलिंडर अरुणिमा के लगा दिया और बोला कि अरुणिमा भगवान् भी चाहता है कि तुम सही सलामत भारत पहुंचो। तुम्हे यंहा सिलिंडर मिल गया इससे बड़ा चमत्कार कुछ नहीं हो सकता। कर्म पर विश्वाश करने वाली इस लड़की ने भगवान को धन्यवाद देकर उतरने की यात्रा शुरू की।
रास्ते मे जब आर्टिफिशल पैर निकल गया तो एक-एक कदम रखना बहुत मुश्किल हो रहा था और माइनस 60 डिग्री टेम्परेचर ने आग मे घी का काम किया। हाथ सुन पड़ते जा रहे थे। अरुणिमा जानती थी कि इतनी सर्दी मे शरीर पर जो असर होता है उसमे तीन स्टेज आती है - रेड,ब्लू और ब्लैक। ब्लैक स्टेज में उस अंग को शरीर से काटना पड़ता है। उसके हाथ रेड से ब्लू स्टेज की और बढ़ रहे थे। उसे बस ये ही ख्याल आ रहा था कि पैर तो पहले ही कट चुका है अब अगर हाथ भी काटना पड़ गया तो क्या होगा। आँखों से आँसू बह निकले। शेरपा ने समझाया- कुछ नहीं होगा, बस तुम नीचे उतरती रहो। जितना नीचे जाएंगे उतना ही फायदा होगा।
अरुणिमा के मन में आया कि अभी हिम्मत नही छोड़नी है और फिर अगले ही पल बहते आँसुओ को पोछकर अपने पैर को घसीट घसीट कर नीचे उतरने लगी। 15 -16 घंटो के इस दर्द भरे इस सफर को पार करके आखिर वो नीचे कैम्प मे आ गयी जैसे ही टेंट की जिप खोली तो टीम के लोग उसे देखकर हैरान रह गये और बताने लगे की उन्होने ये मान लिया था कि वो मर चुकी है।
हौंसलो के तरकश में कोशिश का वो तीर जिन्दा रखो....
हार जाओ जिंदगी में सब कुछ मगर, फिर से जीतने की उम्मीद जिन्दा रखो .....
अरुणिमा को उनकी उपलब्धियों के लिए चौथे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। गर्व की बात यह भी है कि उन्हें ब्रिटेन की एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया है।
भारत सरकार ने 2015 में उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान-पद्मश्री से नवाजा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणिमा की जीवनी-'बॉर्न एगेन इन द माउंटेन'-का लोकार्पण किया। अरुणिमा मानती है कि विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है।
दुनिया के बड़े बड़े मंचो से लाखो लोगो को मोटिवेशन का लेक्चर देने वाले मोटिवेटर के सामने अरुणिमा की 20 मिनट की यू ट्यूब वीडियो मे अपनी इस पूरी कहानी को बड़े ही सुन्दर अंदाज मे बयां किया है और मेरा ये मानना है कि इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद यदि ये स्पीच नहीं सुनी गयी तो ये ब्लॉग अधुरा ही कहा जायेगा
अरुणिमा सिन्हा पर एक मोटिवेशन फिल्म भी बनाई जा रही है। उम्मीद है जल्दी ही हम इसे पर्दे पर देख पाएंगे। पता नहीं क्यो, मुझे ऐसा हमेशा लगा कि लोगो का जो प्यार इस खिलाडी को मिलना चाहिए , जिसकी वो हक़दार भी है , नहीं मिला। अरुणिमा की ऑटोबायोग्राफी सभी को पढ़नी चाहिए और भारत सरकार को शिक्षा के पाठ्यक्रम मे ऐसी सच्ची कहानी शामिल करनी चाहिए जिससे बड़ो के साथ-साथ बच्चो को भी प्रेरणा मिले।
मै एक बात विशेष रूप से कहना चाहूंगा कि जिंदगी से हताश निराश लोग इसके बारे मे एक बार जरूर जाने। जिंदगी जीने का अंदाज बदलने की ताकत रखती है ये सच्ची कहानी।
अरुणिमा के पसंदीदा शेर से ही ब्लॉग समाप्त कर रहा हूँ
अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है ,
अभी तो इस परिंदे का इम्तिहान बाकी है.......
अभी अभी तो लांघा है मैने समुन्द्रो को ,
अभी तो पुरा आसमा बाकी है.....
अगर आप को ये ब्लॉग अच्छा लगा तो अपने कमैंट्स जरूर दीजियेगा
धन्यवाद
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अरुणिमा सिन्हा - साहस का दूसरा नाम










क्या अद्भुत होंसला, सलाम है ऐसी शक्ति को, अकल्पनीय, और अपने शब्दों को मोती रूपी माला में क्या खूब पिरोया है।
ReplyDeleteआपका हार्दिक धन्यवाद
Deleteइस महिला की जीवन यात्रा पढ़ कर तो शायद मुर्दों में भी जान आ जाए। तुम्हारी लेखन कला की तारीफ करना तो सूर्य को चिराग दिखाने के समान है। क्या खूब लिखा है दोस्त।
ReplyDeleteआपका हार्दिक शुक्रिया
DeleteIt's really very good motivational story n best way to represent
ReplyDeleteThanks for Ur kind comment
Deleteअ- अरुणिमा.... अद्भुत.... अकल्पनीय... अतुलनीय।
ReplyDeleteअ- अमित... बहुत ही नपे तुले शब्दों में.. असरदार प्रस्तुति।
Thanks for such an unique comment
DeleteReally awesome,
ReplyDeleteShe is legend. Aftr read this story, I think more than 15 minutes a and decided that I will wrote this story in my book. Thanks Amit ji
And I pray to god for your and Arunima's bright future
Sir thanks a lot for Ur kind words of appreciation
DeleteUltimate, inspirational.....this autobiography is must be included in syllabus of cbse.
ReplyDeleteAnd you expressed the whole story in very intresting way with facts....keep it up and motivate the India....these stories makes India young, daring...with gud mental health.
Thanks sir
DeleteVery interesting and inspiring, words seems from philosopher's pen, keep it up. Hats off to dear Amit.
DeleteGreat thanks sir 🙏
DeleteKoshish karne walon ki kabhi haar nahi hoti.
ReplyDeleteAmitg great. Aapne bahut hi aschhe shabdon ka use kiya hai tatha apne man se shabdon ko ujagar kiya hai.
Bahut badiya.
Thanks sir ji
DeleteInspiring! Proud of her indomitable will. Amit bhai, keep up the good work!
ReplyDeleteThanks a lot for ur kind comment
DeleteTouching Story..
ReplyDeleteThanks a lot sir
DeleteThanks for recognising and spreading her well deserved bravery story to the world. Extremely nicely presented.
ReplyDeleteThanks Sir
DeleteSach mein itne sangarsh ke baad har koi apna hosla, umeed tod deta h. Inke jajbe ko dekhar to maut bhi vapas laut gyi. Amit Ji apke likhne ke tarike ne to is blog mein jaan daal di hai.. Ab to lgta h Agar kuch karne ke liye ek baar thaan liya jaaye, to kuch bhi namumkin nhi h.
ReplyDeleteअद्भुत, बोलने के लिये शब्द नहीं है l बस इतना की बुक जरूर खरीद के पढ़ूंगा l शुक्रिया अमित जी l
ReplyDeleteअद्भुत, अकल्पनीय, और आपका अंदाज़े बयां लाजवाब
ReplyDeleteसच में, मेहनत और विश्वास से कुछ भी संभव है
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