चिड़िया का अधूरा परिवार
बचपन की अनेक घटनायों मे से एक यह घटना मुझे आज जब भी याद आती है तो दुःख होता है उस अन्जान चिड़िया के बच्चे को खोने का। शायद उसका कातिल मैं जो था..........
बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र लगभग 10 साल रही होगी। घर के सामने एक भूसे की बहुत बड़ी दुकान थी वहां पशुओ के लिए हरा चारा भी मिलता था सभी के लिए वो घेर के नाम से जाना जाता था। बच्चो के खेलने की विशेष जगह का दर्जा मिला हुआ था उस घेर को। उस समय गौरैय्या चिड़िया हमारी जिन्दगी मे शामिल थी। छत पर सुखाने के लिए रखे गेंहूँ को खाने सैकड़ो चिड़िया आ जाया करती थी। अटखेलियाँ करती वो प्यारी चिड़िया ना जाने आज कहाँ खो गयी।
एक बार मैं घेर मे भूसे के साथ खेल रहा था तभी अचानक एक चिड़िया का छोटा बच्चा ऊपर दीवारों मे बनाये गए घोसले मे से भूसे के ढेर मे गिर पड़ा। लगभग 15 फ़ीट की ऊंचाई से गिरे उस नवजात बच्चे को वापिस घोसले मे पहुँचाना मुझ जैसे बच्चे के लिए असंभव से भी बड़ी बात थी।
आज के समय वह भूसे की दूकान ऐसी ही है
उस बालमन ने एक चुनौतीपूर्ण कार्य करने की ठान ली तथा बिना किसी को बताये चुपचाप उसे हाथ मे छुपाकर घर ले आया और उसे घर मे दिवार मे बनी अलमारी के सबसे ऊपर थोड़ा सा घासफूस रखकर प्यार से बैठा दिया। उसे प्यार से देखकर उस समय मेरे मन ने कहा - कोई नहीं तेरी परवरिश की जिम्मेदारी अब मेरे ऊपर , कुछ नहीं होगा तुझे , वादा है मेरा।
पर होनी को कौन रोक पाया है। उस दिन मैं थोड़ी -थोड़ी देर मे उसकी सेहत का हालचाल लेता रहा। मैं जब भी जाता तो वह मेरी आहट पाकर ची-ची करके मुँह खोल लेता। मुझे लगा शायद भूख लगी होगी। मैने उसकी चोंच मे थोड़ा सा पानी डाल दिया।
उसके बाद हमारे डाक्टरी दिमाग मे विचार आया जैसे इसकी माँ कुछ खाने को देती है उसी तरह इसे कुछ तो देना पड़ेगा, नहीं तो ये बेचारा भूखा ही मर जायेगा। मैंने चीनी के थोड़े दाने उसकी चोंच मे डाल दिये। मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि चलो कुछ तो खाया बिचारे ने। जैसे - तैसे वो दिन आखिर कट ही गया। अगले दिन भी थोड़ी-थोड़ी देर मे चीनी और पानी का दौर चला। लगने लगा था सब ठीक हो जायेगा। सोचा कि जब ये बड़ा होगा तो इसे आजाद कर दूंगा।
पर अगली सुबह तो कयामत की किरण के साथ आई। जब मैं उसे देखने पहुँचा तो देखा की सैकड़ो चीटियाँ उसके शरीर पर घूम रही थी। वो बेचारा अब इस पापी दुनिया को अलविदा कह चुका था। शायद उसमे ओर हिम्मत नहीं बची थी और चीनी खाने की। बाद मे हमे पता चला कि हमारी चिकित्सा प्रणाली मे ही दोष था।
आज भी जब यह वाक्या याद आता है तो ऐसा लगता है की गौरैय्या के उस प्यारे बच्चे की असमय मौत का कारण मेरा बालमन ही था। पर उस बालमन की कोशिश मे एक सच्चा प्यार , सच्चा विश्वास भी छिपा था।
अमित सिलावट



Too good boss thanks for remembering memory of childhood
ReplyDeleteHeart words can feel by heart only
ReplyDeleteNice
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