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100 Days of Running

*Hundred Day of Running (HDOR) एक रनिंग का त्यौहार* दोस्तों, आज मै आपसे HDOR के बारे में कुछ बातें सांझा करूंगा और मुझे उम्मीद है कि इसमें पार्टिसिपेट करके मेरी तरह आपको भी फायदा होगा , जीवन जीने का नजरिया बदलेगा और स्वस्थ जीवन जीने का सपना साकार होगा।  कहते है अगर कोई काम 100 दिनों तक लगातार किया जाए तो वो आदत बन जाती है और शरीर के लिए दौड़ने से अच्छी आदत भला क्या हो सकती है। HDOR 100 दिनो की  एक अंतरराष्ट्रीय (लगभग 75 देश) विरुचुअल इवेंट है जिसमे कोई भी पार्टिसिपेट कर सकता है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें आपको कम से कम प्रतिदिन 2 km चलना या दौड़ना है। आपने टारगेट आप खुद तय कीजिए उनको पूरा कीजिए।  HDOR आपको यह भी बताता है कि आप अपनी एज कैटेगरी , जेंडर कैटेगरी, कम्पनी, ग्रुप कैटेगरी आदि में किस रैंक पर दौड़ रहे है। सीधे और स्पष्ट शब्दों में बात करे तो मानो जैसे अपने माइंड में आपने एक चौकीदार बिठा दिया हो जो रोज आपको रन करने के लिए प्रेरित करता है। हजारों लोगों की ज़िंदगी बदलने वाली इस इवेंट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि विरुचुअल इवेंट होने के कारण आप कही भी और कभी भी दौड़...

साइकिल की जुबानी

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*साइकिल की जुबानी* अक्सर सुबह सोसायटी से निकलते समय उन धूलचढ़ी साइकिलों से मन ही मन कुछ बातें कर लेता हूं , अगर बोलती तो बताती बेचारी कि हां मैं वो ही तो हूं जिसके लिए उस बच्चे ने दिन रात जिद्द की थी और पापा मम्मी ने भी तो बडे़ चाव से दिलवाई थी, पर आज मेरी सुध लेने वाला वो बच्चा मोबाइल  गेम की मायावी दुनिया में कही गुम हो गया है और मुझे भूल गया है।  अपना समय याद करते है तो 1990 की बात रही होगी , 50 पैसे में आधा घंटा छोटी साइकिल किराए पर लेकर शान से बाजार में चलाया करते थे और जब 2 मिनिट बचते तो दुकान के सामने ऐसे छाती चौड़ी करके निकलते कि बस एक बार दुकानदार बोलें तो सही, और हम कहें कि अभी टाइम है। पापा के ड्यूटी से आने के बाद साइकिल के मालिक बस हम हो जाते थे।  क्रंची स्टाइल से गद्दी तक का बड़ा सफर मजेदार रहा। पहली बार जब सीट पर बैठकर साइकिल चलाई तो यकीन मानिए कि ऐसा लगा मानो राफेल ही उड़ाकर आए हो।  ये बेचारी साइकिल इंतजार करती है कि शायद इनका राइडर एक दिन बाहर निकलेगा और मुझे भी चमकाकर फिर से उस दुनिया को दिखाएगा जिसे देखे एक जमाना हो गया..... ...

अरुणिमा सिन्हा - साहस का दूसरा नाम

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अरुणिमा सिन्हा - साहस  का दूसरा नाम    दो शब्द - सोचा तो कई बार इस महान नाम के बारे मे आपसे कुछ मन की बातें  साँझा करुँ , समय बीत रहा था और इस नाम के बारे में  अपने विचार रखने की  इच्छा भी दिनोदिन  बढ़ती जा रही थी। आज  दिल और कलम दोनों तैयार है आपको इस नाम से और इसके अद्भुत साहसी काम से रूबरू कराने  की | भारत माता की इस परमवीर बेटी के हौसलों  और चट्टान से भी बुलंद इरादों  के आगे विश्व  मे  सबसे ऊंचे हिमालय पर्वत ने भी शीश झुकाया है।बड़े ही गर्व की बात है कि  दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर चढ़ाई करने वाली पहली दिव्यांग  महिला पर्वतारोही बनने का इतिहास भारत की इस बेटी अरुणिमा के नाम लिखा गया है।  मैं  अपने इस ब्लॉग के माध्यम से  एक प्रयास करने की छोटी सी कोशिश करूँगा कि  अगर आप इस नाम से परिचित नहीं है तो आप इसे जिंदगी भर नहीं भूलेंगे और अगर इसके बारे मे  परिचित होंगे तो आपको लगेगा कि  ऐसी महान भारत की साहसी बेटी के बारे मे  इतना कम क्यों पता था...

रूम हीटर और ब्लोअर

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रूम हीटर  और ब्लोअर  दोस्तों, आज मैं  आपके साथ अपने जीवन का एक ऐसा अनोखा किस्सा सांझा  कर रहा हूँ  जिसमे हास्य के साथ एक गहरी शिक्षा भी छिपी है कि  सच्ची दोस्ती मे  छोटी-छोटी बातो का पर्दा होने से दुनिआ किस तरह फायदा उठाती  है। वाक्या  जुड़ा है मेरे खास  दोस्त से ,  जिससे हमारे  पारिवारिक सम्बन्ध थे।  सरकारी कॉलोनी मे  मेरे और उसके घर मे  बस 50 कदम का फैसला था।  5 साल पहले  की बात है , जनवरी के महीने का हड्डिया जमाने वाला ठण्ड का दौर चल रहा था।  ठण्ड से बचने के किये जा रहे सारे इंतजाम नाकाफी लग रहे थे।  पहला सीन  मैं  सपरिवार दोस्त के घर जाता हूँ। ठण्ड  से बचने  के लिए दोस्त ने  एक ब्लोअर खरीदा  था।  दोस्त  ने बताया कि  ये ब्लोअर कल ही तो लेकर आया हूँ।  बहुत ही बढ़िया क़्वालिटी  का है।  रिजल्ट बहुत अच्छा है , पूरा कमरा फटाफट गरम हो जाता है।  भाई ने  उसकी शान  मे  बहुत क...

मेरी पहली मैराथन दौड़

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मेरी पहली मैराथन  दौड़  दो शब्द - जिन्दगी  की किताब मे  मैराथन का एक पन्ना अब  जुड़  चुका  था। मैं  कोई ऐथलीट तो नहीं था, पर  10 किलोमीटर से शुरू  होने वाला ये सफर मैराथन तक कैसे जा पहुँचा, पता नहीं । चार महीने लगे थे इस मिशन को।  इस रोचक कहानी के माध्यम से आप लोगो के साथ दिल की बात शेयर करूँगा । मैराथन की तैयारी के  हर पड़ाव पर रोशनी  डालने का एक छोटा सा प्रयास  है यह कहानी  ।  मुझसे पहले ना  जाने कितने लोग मैराथन दौड़ चुके है और आने वाले समय मे  भी दौड़ते रहेंगे।  पर मेरे  लिए यह मैराथन दौड़ विशेष मायने रखती है।  नई  सोच, नई  ऊर्जा का संचार हुआ है जीवन  मे।  जब आप इसे पढेंगे  तो यकीन मानिये  पूरा पढ़कर रहेंगे ऐसा मेरा मानना  है।  समर्पित - अपनी यह कहानी मैं  उन  गरीब मजदूरों  और  उनके नन्हे प्यारे बच्चों  को समर्पित करता हूँ  जो कोविड  लॉक डाउन के...